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Sunday, December 29, 2019

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Thursday, December 26, 2019

उर्वशी रौतेला का प्राइवेट वीडियो हुआ वायरल, करोड़ों बार देखा गया


उर्वशी रौतेला का प्राइवेट वीडियो हुआ वायरल, करोड़ों बार देखा गया

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Cloud computing is a computing paradigm, where a large pool of systems are connected in private or public networks, to provide dynamically scalable infrastructure for application, data and file storage.

With the advent of this technology, the cost of computation, application hosting, content storage and delivery is reduced significantly.Cloud computing is a practical approach to experience direct cost benefits and it has the potential to transform a data center from a capital-intensive set up to a variable priced environment.


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The idea of cloud computing is based on a very fundamental principal of „reusability of IT capabilities’. The difference that cloud computing brings compared to traditional concepts of “grid computing”, “distributed computing”, “utility computing”, or “autonomic computing” is to broaden horizons across organizational boundaries.

Software as a Service (SaaS): In this model, a complete application is offered to the customer, as a service on demand. A single instance of the service runs on the cloud & multiple end users are serviced. On the customers‟ side, there is no need for upfront investment in servers or software licenses, while for the provider, the costs are lowered, since only a single application needs to be hosted & maintained. Today SaaS is offered by companies such as Google, Salesforce, Microsoft, Zoho, etc

Platform as a Service (Paas): Here, a layer of software, or development environment is encapsulated & offered as a service, upon which other higher levels of service can be built. The customer has the freedom to build his own applications, which run on the provider‟s infrastructure. To meet manageability and scalability requirements of the applications, PaaS providers offer a predefined combination of OS and application servers, such as LAMP platform (Linux, Apache, MySql and PHP), restricted J2EE, Ruby etc. Google‟s App Engine, Force.com, etc are some of the popular PaaS examples.







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Infrastructure as a Service (Iaas): IaaS provides basic storage and computing capabilities as standardized services over the network. Servers, storage systems, networking equipment, data centre space etc. are pooled and made available to handle workloads. The customer would typically deploy his own software on the infrastructure. Some common examples are Amazon, GoGrid, 3 Tera, etc.

Tuesday, October 1, 2019

क्या वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली द्वारा शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्तिसंभव है। वर्णन कीजिए ?

क्या वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली द्वारा शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है। वर्णन कीजिए ?



(xi) शिक्षक प्रशिक्षण को तकनीकी प्रशिक्षण के समान व्यवस्थित किया जाना चाहिए ।
(xii) शिक्षा आचार्यों के प्रशिक्षण और योग्यताओं को कार्य क्षेत्र के अनुसार व्यवस्था और महत्ता प्राप्त होनी चाहिए |
(xiii) शिक्षकों का उद्देश्य आधारित शिक्षा और मूल्यांकन का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ।

इस प्रकार कुछ संक्षिप्त परिवर्तनों के साथ शिक्षा प्रणाली द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों और प्राप्त मूल्यों के बीच के अन्तर को समाप्त किया जा सकता है | जब तक उत्तरदायी शिक्षक और उत्तरदायी शिक्षण संस्थाओं को राष्ट्रीय स्तर पर विकसित नहीं किया जाता तब शिक्षा के लक्ष्यों की प्राप्ति संभव नहीं होगी ।
समय तक नजर अन्दाज नहीं कर सकता, अन्यथा उससे आन्तरिक विघटन प्रारंभ हो जाता है। वर्तमान के आन्तरिक विघटन का समाशोधन राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुकूल शिक्षा व्यवस्था के संगठन से संभव होगा ।


वर्तमान भारत के लिए उपयुक्त लक्ष्यों का निर्धारण करते समय आप किन बातों का ध्यान रखना चाहेंगे ?

वर्तमान भारत के लिए उपयुक्त लक्ष्यों का निर्धारण करते समय आप किन बातों का ध्यान रखना चाहेंगे ?


कार्य स्थल में राष्ट्रीय चेतना की कमी के कारण आतंककारी व विघटनकारी शक्तियां प्रभावी हो रही हैं। शिक्षा के विभिन्न अंगों दवारा राष्ट्रीय चेतना के विकास हेतु प्रयत्न कर राष्ट्रीय निष्ठा को व्यावहारिक धरातल दिया जाना चाहिए | जो वर्तमान भारत राष्ट्र की सर्वोत्तम आकांक्षा है । इसे शिक्षा मान्य लक्ष्य ग्रहण किया जाना चाहिए ।

6.3.13 राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग और संरक्षण


प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और संरक्षण में विकासशील देश पिछड़े हुए हैं भारत की यह जटिल समस्या है संसाधनों के दोहन के नाम पर प्रकृति के साथ अनाचार भावी पीढियों के लिए विकट समस्या उत्पन्न करेगा । जैसे जंगलों की कटान, पानी का दोहन खदानों द्वारा भूमि को खोखला किया जाना । ये वे बिन्दु है जिनसे आज की पीढी तो आनंदमग्न है, बहु लता में उसका दुरूपयोग कर रही हैं । लेकिन जब संसाधन समाप्त हो जायेगे तो भावी पीढ़ी के लिए जीवन निर्वाह असंभव हो जायेगा । इसके लिए संसाधनों के संरक्षण के साथ दोहन को प्रेरित व प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक है जिसकी प्राप्ति शिक्षा दवारा ही संभव है ।।

6.3.14 जनसंख्या नियंत्रण व मानव संसाधन का नियोजन ।


जन विस्फोट विश्व की विकासमान अर्थ व्यवस्थाओं की राष्ट्रीय समस्या है । असीमित जनवृद्धि राष्ट्रीय नकरात्मक विकास को प्रेरित करती है, संसाधनों के अधिग्रहण में संघर्ष की स्थिति बनने से राष्ट्र का पराभव हो जाता हैं अत: शिक्षा के विभिन्न आयामों द्वारा 'जनसंख्या नियंत्रण - हेतु संचेतना का विकास किया जाना चाहिए । साथ ही उपलब्ध जनशक्ति को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाय कि राष्ट्रीय निर्माण में उनकी समुचित भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

6.3.15 पर्यावरण संचेतना का विकास


राष्ट्र अपने पर्यावरण में ही विकसित होता है यदि विकास के नाम पर जल, थल, वायु तभी को प्रदूषित कर दिया जायेगा तो राष्ट्रीय जीवन रोग ग्रस्त होकर पीडित होगा । अत: विकास के पर्यावरण प्रेमी मॉडलों पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए, संचार और ऊर्जा के पाश्चात्य मॉडल वर्तमान पर्यावरण के लिए विषवृक्ष बन गये है यदि इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में राष्ट्रीय जीवन पंगु हो जायेगा । अत: प्रत्येक व्यक्ति में पर्यावरण चेतना का विकास करना होगा । प्रकृति के साथ सहचर्य के सिद्धान्त के व्यवहार रूप में शिक्षा द्वारा है। परिणत किया जा सकता हैं अत: राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा द्वारा पर्यावरणीय संचेतना का विकास एक अनिवार्य उद्देश्य के रूप में होना चाहिए ।


6.3.16 समान आर्थिक विकास


भारत आज विकसित अर्थव्यवस्था में प्रवेश कर चुका है परन्तु असमान आर्थिक विकास जो नियोजन की कमियों का परिणाम हैं । गरीबी और बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त है देश की मजबूत अर्थव्यवस्था में भुखमरी बेरोजगारी एक जटिल समस्या है क्योंकि औपनिवेशिक, शिक्षा प्रणाली में आमजन के होने में बी.ए., एम.ए. की साधारण शिक्षा आती है वह स्नातक व परास्नातक बेरोजगार कहा जाता है इसके निवारण के लिए शिक्षा में जो भी सुधार किये गये वे सिर्फ पेबन्द के रूप में हैं सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली औपनिवेशिक और अभिजात्य स्वरूप को बदलने का प्रयत्न अभी तक नहीं किया गया । लेकिन लोकतांत्रिक देश होने के कारण बेरोजगारी और गरीबी की विकट समस्या का समाधान शिक्षा के माध्यम से ही तलाशना होगा । शिक्षा के विभिन्न अंगों द्वारा इस समस्या के समाधान का प्रयास इसे अपना प्रमुख उद्देश्य बना कर करना पड़ेगा ।

6.4 शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक तत्व


समग्र रूप में शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति का संस्कार होता है । समाज और राष्ट्र के अनुकूल उसके व्यवहारों में परिमार्जन होता है, जो शिक्षा द्वारा ही किया जाता है । परन्तु भारतीय सन्दर्भ में देखे तो शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रतिशत बहुत न्यून है इसके कई कारण है जिनका सांगोपांग अध्ययन करना उद्देश्यों के साथ आवश्यक है ।

शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक, पाठ्यक्रम और विद्यार्थी होते है, शिक्षक और पाठ्यक्रम के साथ शिक्षार्थी की अन्तःक्रिया द्वारा विद्यार्थी का शोधन या संस्कार होता है। सर्वप्रथम उसके विचारों में स्पष्टता फिर व्यवहारों में परिमार्जन होता है । परन्तु यह तभी संभव होता है जब विद्यार्थी कुशल और विज्ञ शिक्षक के साथ पाठ्यक्रम में प्रवेश करे | दुर्भाग्य से परीक्षा प्रधान और नौकरी प्रधान शिक्षा व्यवस्था में बालक और पाठ्यक्रम के बीच अन्तःक्रिया का अवकाश ही नहीं बचता है । विद्यार्थी सिर्फ परीक्षा के लिए पढ़ता है और परीक्षा सिर्फ नौकरी प्राप्ति के लिए होती है । शिक्षक भी परीक्षा की तैयारी का एक माध्यम बन गया है । इसीलिए कोचिंग संस्थान, गाइड, कुन्जी, वनवीक सीरिज संस्थागत व्यवसाय बन गये है । परिणाम स्वरुप शिक्षार्थी शिक्षा से दूर जा रहा है । वह पाठ्यक्रम को कूद कर पार कर लेता है। वह पाठ्यक्रम के अधिकांश भाग का स्पर्शही नहीं करता और कक्षा स्तर पार कर स्नातक, परास्नातक बन जाता है । अत: शिक्षा की शोधन क्रिया विद्यार्थी के व्यवहार का परिमार्जन नहीं कर पाती । इसलिए शिक्षा के उद्देश्य प्राप्त नहीं होते । विभिन्न शिक्षा नीतियों में शिक्षा को नौकरी से पृथक करने की संस्तुति की गई है परन्तु व्यवहारिक रूप से यह असंभव रहा है ।


शिक्षा के उद्देश्यों को शिक्षा के मूल्यों के रूप में परिमार्जन


अतः शिक्षा के उद्देश्यों को शिक्षा के मूल्यों के रूप में प्राप्त करने के लिए कुछ सुझाव नीचे दिये जा रहें है :
(i) समाज के योग्यतम व्यक्तियों को शिक्षण का दायित्व प्राप्त हो । इसके लिए शिक्षण व्यवसाय को श्रेष्ठतम महत्ता प्राप्त होनी चाहिए | शिक्षा की नौकरी प्रधान, डिग्री प्रधान प्रवृत्ति को समाप्त किया जाय । इसके स्थान पर
चरित्र प्रधान, कुशलता प्रधान प्रवृत्ति का विकास किया जाना चाहिए ।
(iii) कोचिंग, कुन्जी, सीरीज परम्परा का निषेध किया जाना चाहिए |
(iv) शिक्षा के स्तरों में मूल्यांकन व्यावसायिक व चारित्रिक कुशलताओं पर आधारित किया जाना चाहिए ।
(v) पाठ्यक्रम का संगठन सूचनाओं के आधार पर न होना चरित्र व व्यवहार के नियामक तत्वों के आधार पर होनी चाहिए ।
(vi) परम्परागत स्पर्धा प्रधान प्रणाली के स्थान पर समता प्रधान शिक्षा प्रणाली को जन्म दिया जाना चाहिए ।
(vii) पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली का अंधानुकरण समाप्त हो । बल्कि शिक्षा के संगठन की स्थापना चीन व जापान तथा अमेरिकी शिक्षा प्रणाली के अनुसार होनी चाहिए ।
(viii) शिक्षा के साथ निर्देशन सेवाओं के अनिवार्य रूप से सक्रिय किया जाना चाहिए ।
(ix) शिक्षा में शोध स्तर को सुधार किया जाना चाहिए ।
(x) शिक्षा शास्त्र के संघ और लोक सेवा आयोगों में एक विषय के रुप में स्थापित किया जाना चाहिए।

Thursday, September 19, 2019

राष्ट्रीय सभा की महान् उपलब्धियों

राष्ट्रीय सभा की महान् उपलब्धियों


राष्ट्रीय समा ने पुराने कूड़े-कर्कट को साफ कर दिया था। इसने प्रणित सामन्ती अधिकारों का अन्त किया। देश में एकता स्थापित की। फांस को प्रथम लिखित संविधान प्रदान किया। नवीन संविधान द्वारा इसने जनता को सार्वभौमिकता स्थापित की। इसने नये राजनीतिक  दिन में लोकतन्त्र के लिए एक स्मारक खड़ा कर दिया था। राष्ट्रीय सभा ने जनता उत्साह को जागृत कर दिया आर इस बात का प्रयास किया कि देश में एक से कानून त हों तथा करों का बोझ सबके ऊपर एक-सा पड़े ।"इसने एक सामाजिक और सारिक क्रांति उत्पन्न कर दी थी और सार्वजनिक नीति का आधार जनता की इच्छा भाना था। इसने सब काल के लिए और सारी दुनिया के लिए एक नये सन्देश कीजनसाधारण के वैयक्तिक महत्व के संदेश की-उद्घोषणा कर दी थी।"

राष्ट्रीय सभा के कार्यों में दोष


राष्ट्रीय सभा की महान् उपलब्धियों के बावजूद उसकी आलोचना की जाती है। राष्ट्रीय सभा के कार्यों में कई दोष थे :

(i) इसने नागरिक अधिकारों की घोषणा कर जनता में ऐसी आशाएँ उत्पन्न कर दी, जिनको संविधान में स्वयं वह पूरी न कर सकी ।

( नागरिकों को सक्रिय तथा निष्क्रिय कोटि में विभाजित कर सभा ने मानव के अधिकारों की उल्लंघना की । मताधिकार सम्पत्ति पर आधारित कर हजारों लोगों को मतदान से वंचित कर दिया। इस प्रकार नागरिकों से न केवल समानता का अधिकार छीन लिया गया, वरन, पुराने विशेषाधिकारों की जगह नये विशेषाधिकार स्थापित कर दिये गये।

(iii) अतिविकेन्द्रीकरण की नीति अपनाने से केन्द्र की सरकार का स्थानीय अधिकारियों पर नियन्त्रण न रहा। इससे प्रशासन में शिथिलता आ गयी।

(iv) व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका को पृथक् कर दिया गया । राजा के मन्त्री व्यवस्थापिका के सदस्य नहीं हो सकते थे और व्यवस्थापिका के सदस्य राजा के मन्त्री नहीं हो सकते थे। राजा को व्यवस्थापिका को भंग करने का अधिकार नहीं था । इस प्रकार व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका एक दूसरे की सहायक नहीं, अपितु विरोधी बनी रहीं।

(v) निर्वाचन द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति करना अव्यावहारिक था। इससे वे निर्भय होकर न्याय नहीं कर सकते थे ।

(vi) जो व्यक्ति एक बार व्यवस्थापिका सभा का सदस्य हो जाता वह दूसरी बार उसका सदस्य नहीं हो सकता था। इस प्रकार अनुभव को उपेक्षित किया गया।

(vii) सिविल कांस्टीट्यूशन ऑफ दी क्लर्जी द्वारा देश भर में धर्म से जुड़े लोगों के मध्य राज्य के नियंत्रण के प्रश्न को लेकर तनाव उत्पन्न हो गया ।

(viii) इसने मध्यम श्रेणी के लोगों के हितों को सबसे अधिक प्रोत्साहन दिया । कृषकों एवं मजदूरों के हितों को उपेक्षित रखा गया।


राष्ट्रीय सभा के कार्यों का मूल्यांकन


राष्ट्रीय सभा के कार्यों की आलोचना करना सरल है किन्तु पुरानी अत्याचारपूर्ण यवस्था का विरोध करना कोई हँसी-खेल नहीं था। बड़ी निभीकता एवं अदम्य उत्साह के साथ इसने पुरानी व्यवस्था का विरोध किया। राष्ट्रीय सभा के कार्यों का मूल्यांकन परत समय हमें उन प्रतिकूल परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए जिनके मध्य का कार्य करना पड़ा। फिर इसके सदस्यों को वैधानिक तथा प्रशासनिक अनुभव भी प्राप्त नहीं था । इतिहासकार एच. जी. वैल्स का विचार है कि इस सभा का बहुत-सा रचनात्मक तथा चिस्थाई प्रकृति का था किन्तु इस सभा का बहुत-सा कार्य प्रायोगिक र अस्थायी सिद्ध हआ। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय संविधान जनता की सार्वभौमिक सत्ता, सामाजिक समानता, मानव अधिकारों की घोषणा. सामन्तवाद का अन्त आदेद्वार ति के सिद्धान्तों की स्थापना की तथापि वह स्थायी रूप से सादेधान लागू करने में असफल रही। राजनैतिक एवं आर्थिक समस्याओं को सुलझाने में सावधान सभा असमर्थ रहो. इसलिए अव्यवस्था फैली।

संविधान सभा


संविधान सभा रजा व्या राजतंत्र के विरुद्ध नहीं थी। यदि राजा संयम एवं दूरदर्शिता से कार लेता, जो नये सावधान के अन्तर्गत प्रतिष्ठापूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता था और अपने देश की सेवा कर सकता था। किन्तु उसने एक ऐसी मयेकर मूल कर दी जिससे उसका सर्वनाश ईशया बाललील के पतन के बाद फ्रांस के अनेक सामन्त देश छोड़कर भाग गये थे और पसी राज्यों में जाकर शरण ले ली थी। वे उन देशों की सरकार से मिल का मोर को कान्तिकारी सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे, उनमें राजा कामाई मौका न लोगों के बहकावे में आकर राजा ने फ्रांस से सपरिवार भागकर आस्ट्रिया पहुंचने की शेजना बनाई। 20 जून 1792 को लुई अपने परिवार के साथ वेश बदल कर रवाना हा परतु जब यह फ्रांस की सीमा पार करने वाला था उसी समय एक गुरुक ने उसे पहचान लिया एवं उसका रास्ता रोक दिया। उसे पेरिस लौटना पड़ा। इससे राजा बहुत बदनाम हुडा और देशदोही समझा जाने लगा।

नयी विधानसभा


नये संविधान के अनुसार राष्ट्रीय सांविधान सभा का विसर्जन कर नयी विधानसभा का निर्वाचन हजा। नव निर्वाचित विधानसभा में उन लोगों का बहुमत आया जो सांविधानिक राजतन के पहापातीधारे समझते दे कि क्रान्ति का काम पूरा हो गया और अब देशहित में नये सरिधान का क्रियान्दान होना चाहिये । किन्तु सभा में ऐसे सदस्यों की संख्या भी पर्याप्त योजो राजतन का जन्त करके गणतन्त्र कायम करना चाहते थे। गणतन्त्रवादियों के दो दल ये-जैकोदिन और जिरदिस्त । इनमें जैकोबिन दल के विचार अधिक उग्र और कोशिकारी है। उनके नेताओं में मारा होतो. रोजस्पियेर आदि प्रमुख थे।


नेपोलियन का उदय और उत्थान


नयी विधानसभा के सम्मुख एक समस्या थी-उन फ्रांसीसियों को नियन्त्रण में रखना, जो क्रान्ति विरोधी थे तथा उसे कुचलने का प्रयास कर रहे थे। इनमें बहुत से पादरी थे, जिन्होंने शई के सम्बन्ध में नवीन व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया था। इसके अलावा बहुत से कुलीन वर्ग के लोग दे, जो भाग कर विदेशों में चले गये थे। ये लोग विदेशों में क्रांति के विरोध में जनमत तैयार कर रहे थे और वहाँ के शासकों को फ्रांस पर आक्रममा करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। प्रशा एवं आस्ट्रिया ने यह घोषित किया कि फ्रांस से यूरोप के सभी राज्यों के लिए खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने अन्य राज्यों से भी सहयोग देने की मांग की। कान्ति की रक्षा के लिए फ्रांस को विदेशी शक्तियों से टकर लेनी पड़ी। फलतः एक ऐसे ऐतिहासिक युद्ध की शुरुआत हुई, जिसने शान्ति को सर्वदा नवीन दिशा प्रदान को, जिसका यूरोप के इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा । इसके कारण फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना हुई. फिर आतेक राज्य कायम हुआ जिसकी पृष्ठभूमि में नेपोलियन का उदय और उत्थान हो सका।

फ्रांस ने 20 अप्रैल, 1792 को आस्ट्रिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। युद्ध की घोषणा ने क्रांति का रूप बदल दिया। युद्ध के आरम्भ होते ही पेरिस की क्रान्तिकारी रकार ने बहुत से लोगों को जो क्रान्ति के शत्रु समझे जाते थे, गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया। जैसी ही विदेशी सेनाओं ने फ्राँस की भूमि में प्रवेश किया इन सब बन्दिया की हत्या कर दी गई जिससे वे शत्रुओं से मिलकर देश के खिलाफ षड्यन्त्र न रच सकें और राजा और उसके परिवार को बन्दी बना लिया गया। राज पद समाप्त कर दिया गया देश का नया संविधान बनाने के लिए राष्ट्रीय कन्वेन्शन (राष्ट्रीय सम्मेलन) का चुनाव कराया गया।

देनिस कोर्ट की शपथ

देनिस कोर्ट की शपथ


राजा की शासन आज्ञा के विरुद्ध एवं बिना स्वीकृति के राष्ट के प्रतिनिधियों को साधारण घोषणा ने प्राचीन सामन्तवादी एस्टेट्स जनरल को राष्ट्रीय सभा में रूपान्तरित किया एवं इसे फ्राँस में वैधानिक शासन स्थापित करने का उत्तरदायित्व सौपा । देनिस कोर्ट की शपथ दैविक अधिकारों पर आधारित निरंकुश राजतंत्र की समाप्ति, एवं जन इच्छा पर आधारित सीमित राजतंत्र के आरम्भ होने की घोषणा थी।

राष्ट्रीय सभा की घोषणा


इन कार्यवाहियों से चितित होकर राजा ने 23 जून को तीनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलायी, जिसमें राजा ने कतिपय सुधार लागू करने की इच्छा व्यक्त की किन्तु इसके साथ ही उसने तृतीय वर्ग के द्वारा राष्ट्रीय सभा की घोषणा को अमान्य करार दिया और रानी के दबाव में आकर तीनों वर्गों को पृथक्-पृथक् बैठने और मतदान करने की आज्ञा दी। राजा की आज्ञा से करों पर विचार करने के लिए तीनों वर्ग सम्मिलित रूप से बैठ सकते थे। किन्तु इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया था कि कुलीन लोगों के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार तथा विशेषाधिकार ज्यों के त्यों बने रहेंगे । राजा की इस नीति का विरोध कुछ कुलीन तथा निम्न पादरी वर्ग के लोगों ने किया। राजा को सहयोग देने वाले उसके भाषण के पश्चात् सभा भवन से बाहर चले गये परन्तु जनसाधारण के प्रतिनिधि वहीं बैठे रहे। ऐसे समय में मिराबो ने साहसिक घोषणा कर जन प्रतिनिधियों का मार्ग दर्शन किया। मिराबो ने गरज कर कहा “हम यहाँ जनता की इच्छा से उपस्थित हुए हैं और जब तक बन्दूक की गोली से हमको नहीं हटाया जायेगा तब तक हम यहाँ से नहीं जायेगे। अधिवेशन के अध्यक्ष ने मिराबो की उक्त घोषणा की सूचना राजा को दे दी। राजा ने कहा “अगर वह बैठना चाहते हैं तो उन्हें बैठने दो।"

मिराबो की घोषणा


राजा की स्थिति बड़ी कठिन हो गई। दो दिन बाद बहुत से पादरी और कुलीन भी राष्ट्रीय समा में सम्मिलित हो गये । अन्त में राजा को परिस्थितियों के सामने झुकना पड़ा और उसने 27 जून को तीनों सदनों को एक साथ बैठने की अनुमति दे दी। इस प्रकार राष्ट्रीय सभा को वैधानिक मान्यता मिल गई। यह सर्वसाधारण वर्ग की पहली महत्वपूर्ण विजय थी। उसी समय राजा के हाथों से सत्ता निकल कर राष्ट्रीय सभा के हाथों में चली तीनों सदनों के साथ बैठने से राष्ट्रीय महासभा का महत्व बढ़ गया। उसने संविधान बनाने का कार्य अपने हाथ में लिया। 9 जुलाई को राष्ट्रीय सभा ने अपने आप को संविधान समा घोषित कर दिया। इस प्रकार नयी सामाजिक व्यवस्था का प्रवर्तन करने और उसके संवैधानिक आधार को तैयार करने के अपने कर्तव्य की घोषणा कर दी। राजा को राष्ट्रीय समा के इस निर्णय को स्वीकार करना पड़ा।


संविधान सभा को दबाने का प्रयास


राजा और समा दोनों ही एक दूसरे के प्रति शंकित थे। पेरिस की स्थिति बहुत उत्तेजक बन गयी थी। अकाल, बेकारी तथा जनप्रिय वक्ताओं के उत्तेजक भाषणों ने स्थिति को विस्फोटक बनाने में सहयोग दिया। उधर राजा पर कुलीनों और रानी का रहा था। अन्त में राजा ने संविधान सभा को दबाने का प्रयास किया। यह ताको अदूरदर्शिता का प्रमाण था। संविधान सभा के सदस्यों ने सैनिकों के बढ़ते हुए को देखते हुए अनुभव किया कि उनके लिए स्वतन्त्र रूप से कार्य करना सच्याच नहीं होगा। इस पर मिराबो के माध्यम से जुई को यह संदेश भेजा गया कि यह सैनिकों को वापस भेज दे।

इस पर राजा ने उत्तर दिया कि यदि प्रतिनिधि सैनिकों से अपील हो गये हैं तो पेरिस छोड़ कर चले जाये किन्तु प्रतिनिधि राजा को झमको के आगे के नहीं 11 जुलाई को लोकप्रिय वित्तमन्त्री नेकर को पदव्युत कर दिया गया और तत्काल देश छोड़ने के आदेश दिये गये। यह समाचार सम्पूर्ण पेरिस में बड़ी तेजी के साथ फैल गया और उत्तेजना का वातावरण बन गया। कामिल देमूले नामक पत्रकार और उस क्रान्तिकारियों ने पेरिस के लोगों को बहुत उत्तेजित किया और हथियार एकत्रित करके आगे बढ़ने को प्रेरित किया। 13 जुलाई को रोटी और शराब की दुकानों को लूटा गया यह अफवाह फैली कि सैनिकों को पेरिस भेजा जा रहा है। इससे उत्तेजित होकर लोगों ने शस्त्रास्त्र संग्रह करने का निर्णय किया। नगर में जहाँ भी शस्त्रास्त्र उपलब हो सकते थे वहाँ लूट खसोट कर भीड़ ने हथिया लिया।

बास्तोल के प्रशासक


14 जुलाई को सुबह से ही पेरिस का वातावरण बदला हुआ था। नगर में प्रशासन ठप्प हो चुका था। लोग सुबह से ही हथियारों की तलाश में घूम रहे थे। किसी ने यह अफवाह फैला दी कि बास्तोल के दुर्ग में शस्त्रों का भण्डार है और यह जानकर मोड़ उधर ही उमड़ पड़ी। बास्तोल पेरिस से थोड़ी ही दूरी पर छोटा सा किला था जहाँ प्राय राजनीतिक बन्दी रखे जाते थे। जनता इस किले को निरंकुशता एवं अत्याचार का गढ़ मानकर उससे घृणा करती थी। बास्तोल के प्रशासक ने अपने कुछ सैनिकों की सहायता से कुछ दूर तक भीड़ को रोकने का प्रयास किया परन्तु अन्त में उन्होंने समर्पण कर दिया। भीड़ किले में घुस गई और उसने सभी बन्दियों को रिहा करके किले को तहस-नहस कर डाला। किले के अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया। लोग यादगार के लिए यहाँ से लोहे और पत्थर के टुकड़े अपने-अपने घर ले गये और बास्तोल का नामोनिशान मिटा दिया ।


बास्तील के पतन


बास्तील के पतन से पेरिस में अपार हर्ष की लहर दौड़ गई। बास्तील का पतन वैसे कोई बड़ी घटना नहीं थी । एक मामूली किले पर उग्र भीड़ ने कब्जा करके उसको नष्ट कर दिया था, पर यह घटना बदले हुए समय के आगमन की पूर्व सूचना थी। जब राजा को बास्तील के पतन का समाचार मिला तो उसने कहा कि 'अरे! यह तो विद्रोह पास खड़े दरबारी ने कहा 'राजन् यह क्रान्ति है। सचमुख यह क्रान्ति का बिगुल था। बास्तील एक किला ही नहीं, एक सिद्धान्त और एक प्रतीक था। उसका पतन सिद्धान्त और परम्परा का पतन था।

राष्ट्रीय दिवस 14 जुलाई


बास्तील के पतन की घटना का फ्रांस के इतिहास में विशेष महत्व है। आज भी स में अपना राष्ट्रीय दिवस 14 जुलाई को ही मनाया जाता है। फ्रांस के चूचों राजाओं "पुरान सफेद झंडे के स्थान पर लाल, सफेद तथा नीले रंग का नया झंडा अपना लिया पा बास्तील के पतन को एकतन्त्र की पराजय और स्वतन्त्रता की जीत समझा गया।

"सारे क्रान्ति काल में कारतोस के पास सो रखो और गपूर याहारे परिणामों शाले अन्य कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं हुई ...इस दुर के पहर को केवल कार में हो गयी अपितु सारे संसार में स्वादाता के सह-सन्म का परिचायक आणा गया।

व्यवस्था का कारण रह नहीं था। इसका कारण सो हुई और था उस पर शासन था जिन्होंने युळे तथा स्वारी आमोद-प्रमोद में इस का अपाध्याय किया। इस शासकों के विपरीत तुई सोलहों अपेक्षाकृत एक स्टार शासक था।

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