Thursday, September 19, 2019

राष्ट्रीय सभा की महान् उपलब्धियों

राष्ट्रीय सभा की महान् उपलब्धियों


राष्ट्रीय समा ने पुराने कूड़े-कर्कट को साफ कर दिया था। इसने प्रणित सामन्ती अधिकारों का अन्त किया। देश में एकता स्थापित की। फांस को प्रथम लिखित संविधान प्रदान किया। नवीन संविधान द्वारा इसने जनता को सार्वभौमिकता स्थापित की। इसने नये राजनीतिक  दिन में लोकतन्त्र के लिए एक स्मारक खड़ा कर दिया था। राष्ट्रीय सभा ने जनता उत्साह को जागृत कर दिया आर इस बात का प्रयास किया कि देश में एक से कानून त हों तथा करों का बोझ सबके ऊपर एक-सा पड़े ।"इसने एक सामाजिक और सारिक क्रांति उत्पन्न कर दी थी और सार्वजनिक नीति का आधार जनता की इच्छा भाना था। इसने सब काल के लिए और सारी दुनिया के लिए एक नये सन्देश कीजनसाधारण के वैयक्तिक महत्व के संदेश की-उद्घोषणा कर दी थी।"

राष्ट्रीय सभा के कार्यों में दोष


राष्ट्रीय सभा की महान् उपलब्धियों के बावजूद उसकी आलोचना की जाती है। राष्ट्रीय सभा के कार्यों में कई दोष थे :

(i) इसने नागरिक अधिकारों की घोषणा कर जनता में ऐसी आशाएँ उत्पन्न कर दी, जिनको संविधान में स्वयं वह पूरी न कर सकी ।

( नागरिकों को सक्रिय तथा निष्क्रिय कोटि में विभाजित कर सभा ने मानव के अधिकारों की उल्लंघना की । मताधिकार सम्पत्ति पर आधारित कर हजारों लोगों को मतदान से वंचित कर दिया। इस प्रकार नागरिकों से न केवल समानता का अधिकार छीन लिया गया, वरन, पुराने विशेषाधिकारों की जगह नये विशेषाधिकार स्थापित कर दिये गये।

(iii) अतिविकेन्द्रीकरण की नीति अपनाने से केन्द्र की सरकार का स्थानीय अधिकारियों पर नियन्त्रण न रहा। इससे प्रशासन में शिथिलता आ गयी।

(iv) व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका को पृथक् कर दिया गया । राजा के मन्त्री व्यवस्थापिका के सदस्य नहीं हो सकते थे और व्यवस्थापिका के सदस्य राजा के मन्त्री नहीं हो सकते थे। राजा को व्यवस्थापिका को भंग करने का अधिकार नहीं था । इस प्रकार व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका एक दूसरे की सहायक नहीं, अपितु विरोधी बनी रहीं।

(v) निर्वाचन द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति करना अव्यावहारिक था। इससे वे निर्भय होकर न्याय नहीं कर सकते थे ।

(vi) जो व्यक्ति एक बार व्यवस्थापिका सभा का सदस्य हो जाता वह दूसरी बार उसका सदस्य नहीं हो सकता था। इस प्रकार अनुभव को उपेक्षित किया गया।

(vii) सिविल कांस्टीट्यूशन ऑफ दी क्लर्जी द्वारा देश भर में धर्म से जुड़े लोगों के मध्य राज्य के नियंत्रण के प्रश्न को लेकर तनाव उत्पन्न हो गया ।

(viii) इसने मध्यम श्रेणी के लोगों के हितों को सबसे अधिक प्रोत्साहन दिया । कृषकों एवं मजदूरों के हितों को उपेक्षित रखा गया।


राष्ट्रीय सभा के कार्यों का मूल्यांकन


राष्ट्रीय सभा के कार्यों की आलोचना करना सरल है किन्तु पुरानी अत्याचारपूर्ण यवस्था का विरोध करना कोई हँसी-खेल नहीं था। बड़ी निभीकता एवं अदम्य उत्साह के साथ इसने पुरानी व्यवस्था का विरोध किया। राष्ट्रीय सभा के कार्यों का मूल्यांकन परत समय हमें उन प्रतिकूल परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए जिनके मध्य का कार्य करना पड़ा। फिर इसके सदस्यों को वैधानिक तथा प्रशासनिक अनुभव भी प्राप्त नहीं था । इतिहासकार एच. जी. वैल्स का विचार है कि इस सभा का बहुत-सा रचनात्मक तथा चिस्थाई प्रकृति का था किन्तु इस सभा का बहुत-सा कार्य प्रायोगिक र अस्थायी सिद्ध हआ। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय संविधान जनता की सार्वभौमिक सत्ता, सामाजिक समानता, मानव अधिकारों की घोषणा. सामन्तवाद का अन्त आदेद्वार ति के सिद्धान्तों की स्थापना की तथापि वह स्थायी रूप से सादेधान लागू करने में असफल रही। राजनैतिक एवं आर्थिक समस्याओं को सुलझाने में सावधान सभा असमर्थ रहो. इसलिए अव्यवस्था फैली।

संविधान सभा


संविधान सभा रजा व्या राजतंत्र के विरुद्ध नहीं थी। यदि राजा संयम एवं दूरदर्शिता से कार लेता, जो नये सावधान के अन्तर्गत प्रतिष्ठापूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता था और अपने देश की सेवा कर सकता था। किन्तु उसने एक ऐसी मयेकर मूल कर दी जिससे उसका सर्वनाश ईशया बाललील के पतन के बाद फ्रांस के अनेक सामन्त देश छोड़कर भाग गये थे और पसी राज्यों में जाकर शरण ले ली थी। वे उन देशों की सरकार से मिल का मोर को कान्तिकारी सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे, उनमें राजा कामाई मौका न लोगों के बहकावे में आकर राजा ने फ्रांस से सपरिवार भागकर आस्ट्रिया पहुंचने की शेजना बनाई। 20 जून 1792 को लुई अपने परिवार के साथ वेश बदल कर रवाना हा परतु जब यह फ्रांस की सीमा पार करने वाला था उसी समय एक गुरुक ने उसे पहचान लिया एवं उसका रास्ता रोक दिया। उसे पेरिस लौटना पड़ा। इससे राजा बहुत बदनाम हुडा और देशदोही समझा जाने लगा।

नयी विधानसभा


नये संविधान के अनुसार राष्ट्रीय सांविधान सभा का विसर्जन कर नयी विधानसभा का निर्वाचन हजा। नव निर्वाचित विधानसभा में उन लोगों का बहुमत आया जो सांविधानिक राजतन के पहापातीधारे समझते दे कि क्रान्ति का काम पूरा हो गया और अब देशहित में नये सरिधान का क्रियान्दान होना चाहिये । किन्तु सभा में ऐसे सदस्यों की संख्या भी पर्याप्त योजो राजतन का जन्त करके गणतन्त्र कायम करना चाहते थे। गणतन्त्रवादियों के दो दल ये-जैकोदिन और जिरदिस्त । इनमें जैकोबिन दल के विचार अधिक उग्र और कोशिकारी है। उनके नेताओं में मारा होतो. रोजस्पियेर आदि प्रमुख थे।


नेपोलियन का उदय और उत्थान


नयी विधानसभा के सम्मुख एक समस्या थी-उन फ्रांसीसियों को नियन्त्रण में रखना, जो क्रान्ति विरोधी थे तथा उसे कुचलने का प्रयास कर रहे थे। इनमें बहुत से पादरी थे, जिन्होंने शई के सम्बन्ध में नवीन व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया था। इसके अलावा बहुत से कुलीन वर्ग के लोग दे, जो भाग कर विदेशों में चले गये थे। ये लोग विदेशों में क्रांति के विरोध में जनमत तैयार कर रहे थे और वहाँ के शासकों को फ्रांस पर आक्रममा करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। प्रशा एवं आस्ट्रिया ने यह घोषित किया कि फ्रांस से यूरोप के सभी राज्यों के लिए खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने अन्य राज्यों से भी सहयोग देने की मांग की। कान्ति की रक्षा के लिए फ्रांस को विदेशी शक्तियों से टकर लेनी पड़ी। फलतः एक ऐसे ऐतिहासिक युद्ध की शुरुआत हुई, जिसने शान्ति को सर्वदा नवीन दिशा प्रदान को, जिसका यूरोप के इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा । इसके कारण फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना हुई. फिर आतेक राज्य कायम हुआ जिसकी पृष्ठभूमि में नेपोलियन का उदय और उत्थान हो सका।

फ्रांस ने 20 अप्रैल, 1792 को आस्ट्रिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। युद्ध की घोषणा ने क्रांति का रूप बदल दिया। युद्ध के आरम्भ होते ही पेरिस की क्रान्तिकारी रकार ने बहुत से लोगों को जो क्रान्ति के शत्रु समझे जाते थे, गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया। जैसी ही विदेशी सेनाओं ने फ्राँस की भूमि में प्रवेश किया इन सब बन्दिया की हत्या कर दी गई जिससे वे शत्रुओं से मिलकर देश के खिलाफ षड्यन्त्र न रच सकें और राजा और उसके परिवार को बन्दी बना लिया गया। राज पद समाप्त कर दिया गया देश का नया संविधान बनाने के लिए राष्ट्रीय कन्वेन्शन (राष्ट्रीय सम्मेलन) का चुनाव कराया गया।

देनिस कोर्ट की शपथ

देनिस कोर्ट की शपथ


राजा की शासन आज्ञा के विरुद्ध एवं बिना स्वीकृति के राष्ट के प्रतिनिधियों को साधारण घोषणा ने प्राचीन सामन्तवादी एस्टेट्स जनरल को राष्ट्रीय सभा में रूपान्तरित किया एवं इसे फ्राँस में वैधानिक शासन स्थापित करने का उत्तरदायित्व सौपा । देनिस कोर्ट की शपथ दैविक अधिकारों पर आधारित निरंकुश राजतंत्र की समाप्ति, एवं जन इच्छा पर आधारित सीमित राजतंत्र के आरम्भ होने की घोषणा थी।

राष्ट्रीय सभा की घोषणा


इन कार्यवाहियों से चितित होकर राजा ने 23 जून को तीनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलायी, जिसमें राजा ने कतिपय सुधार लागू करने की इच्छा व्यक्त की किन्तु इसके साथ ही उसने तृतीय वर्ग के द्वारा राष्ट्रीय सभा की घोषणा को अमान्य करार दिया और रानी के दबाव में आकर तीनों वर्गों को पृथक्-पृथक् बैठने और मतदान करने की आज्ञा दी। राजा की आज्ञा से करों पर विचार करने के लिए तीनों वर्ग सम्मिलित रूप से बैठ सकते थे। किन्तु इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया था कि कुलीन लोगों के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार तथा विशेषाधिकार ज्यों के त्यों बने रहेंगे । राजा की इस नीति का विरोध कुछ कुलीन तथा निम्न पादरी वर्ग के लोगों ने किया। राजा को सहयोग देने वाले उसके भाषण के पश्चात् सभा भवन से बाहर चले गये परन्तु जनसाधारण के प्रतिनिधि वहीं बैठे रहे। ऐसे समय में मिराबो ने साहसिक घोषणा कर जन प्रतिनिधियों का मार्ग दर्शन किया। मिराबो ने गरज कर कहा “हम यहाँ जनता की इच्छा से उपस्थित हुए हैं और जब तक बन्दूक की गोली से हमको नहीं हटाया जायेगा तब तक हम यहाँ से नहीं जायेगे। अधिवेशन के अध्यक्ष ने मिराबो की उक्त घोषणा की सूचना राजा को दे दी। राजा ने कहा “अगर वह बैठना चाहते हैं तो उन्हें बैठने दो।"

मिराबो की घोषणा


राजा की स्थिति बड़ी कठिन हो गई। दो दिन बाद बहुत से पादरी और कुलीन भी राष्ट्रीय समा में सम्मिलित हो गये । अन्त में राजा को परिस्थितियों के सामने झुकना पड़ा और उसने 27 जून को तीनों सदनों को एक साथ बैठने की अनुमति दे दी। इस प्रकार राष्ट्रीय सभा को वैधानिक मान्यता मिल गई। यह सर्वसाधारण वर्ग की पहली महत्वपूर्ण विजय थी। उसी समय राजा के हाथों से सत्ता निकल कर राष्ट्रीय सभा के हाथों में चली तीनों सदनों के साथ बैठने से राष्ट्रीय महासभा का महत्व बढ़ गया। उसने संविधान बनाने का कार्य अपने हाथ में लिया। 9 जुलाई को राष्ट्रीय सभा ने अपने आप को संविधान समा घोषित कर दिया। इस प्रकार नयी सामाजिक व्यवस्था का प्रवर्तन करने और उसके संवैधानिक आधार को तैयार करने के अपने कर्तव्य की घोषणा कर दी। राजा को राष्ट्रीय समा के इस निर्णय को स्वीकार करना पड़ा।


संविधान सभा को दबाने का प्रयास


राजा और समा दोनों ही एक दूसरे के प्रति शंकित थे। पेरिस की स्थिति बहुत उत्तेजक बन गयी थी। अकाल, बेकारी तथा जनप्रिय वक्ताओं के उत्तेजक भाषणों ने स्थिति को विस्फोटक बनाने में सहयोग दिया। उधर राजा पर कुलीनों और रानी का रहा था। अन्त में राजा ने संविधान सभा को दबाने का प्रयास किया। यह ताको अदूरदर्शिता का प्रमाण था। संविधान सभा के सदस्यों ने सैनिकों के बढ़ते हुए को देखते हुए अनुभव किया कि उनके लिए स्वतन्त्र रूप से कार्य करना सच्याच नहीं होगा। इस पर मिराबो के माध्यम से जुई को यह संदेश भेजा गया कि यह सैनिकों को वापस भेज दे।

इस पर राजा ने उत्तर दिया कि यदि प्रतिनिधि सैनिकों से अपील हो गये हैं तो पेरिस छोड़ कर चले जाये किन्तु प्रतिनिधि राजा को झमको के आगे के नहीं 11 जुलाई को लोकप्रिय वित्तमन्त्री नेकर को पदव्युत कर दिया गया और तत्काल देश छोड़ने के आदेश दिये गये। यह समाचार सम्पूर्ण पेरिस में बड़ी तेजी के साथ फैल गया और उत्तेजना का वातावरण बन गया। कामिल देमूले नामक पत्रकार और उस क्रान्तिकारियों ने पेरिस के लोगों को बहुत उत्तेजित किया और हथियार एकत्रित करके आगे बढ़ने को प्रेरित किया। 13 जुलाई को रोटी और शराब की दुकानों को लूटा गया यह अफवाह फैली कि सैनिकों को पेरिस भेजा जा रहा है। इससे उत्तेजित होकर लोगों ने शस्त्रास्त्र संग्रह करने का निर्णय किया। नगर में जहाँ भी शस्त्रास्त्र उपलब हो सकते थे वहाँ लूट खसोट कर भीड़ ने हथिया लिया।

बास्तोल के प्रशासक


14 जुलाई को सुबह से ही पेरिस का वातावरण बदला हुआ था। नगर में प्रशासन ठप्प हो चुका था। लोग सुबह से ही हथियारों की तलाश में घूम रहे थे। किसी ने यह अफवाह फैला दी कि बास्तोल के दुर्ग में शस्त्रों का भण्डार है और यह जानकर मोड़ उधर ही उमड़ पड़ी। बास्तोल पेरिस से थोड़ी ही दूरी पर छोटा सा किला था जहाँ प्राय राजनीतिक बन्दी रखे जाते थे। जनता इस किले को निरंकुशता एवं अत्याचार का गढ़ मानकर उससे घृणा करती थी। बास्तोल के प्रशासक ने अपने कुछ सैनिकों की सहायता से कुछ दूर तक भीड़ को रोकने का प्रयास किया परन्तु अन्त में उन्होंने समर्पण कर दिया। भीड़ किले में घुस गई और उसने सभी बन्दियों को रिहा करके किले को तहस-नहस कर डाला। किले के अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया। लोग यादगार के लिए यहाँ से लोहे और पत्थर के टुकड़े अपने-अपने घर ले गये और बास्तोल का नामोनिशान मिटा दिया ।


बास्तील के पतन


बास्तील के पतन से पेरिस में अपार हर्ष की लहर दौड़ गई। बास्तील का पतन वैसे कोई बड़ी घटना नहीं थी । एक मामूली किले पर उग्र भीड़ ने कब्जा करके उसको नष्ट कर दिया था, पर यह घटना बदले हुए समय के आगमन की पूर्व सूचना थी। जब राजा को बास्तील के पतन का समाचार मिला तो उसने कहा कि 'अरे! यह तो विद्रोह पास खड़े दरबारी ने कहा 'राजन् यह क्रान्ति है। सचमुख यह क्रान्ति का बिगुल था। बास्तील एक किला ही नहीं, एक सिद्धान्त और एक प्रतीक था। उसका पतन सिद्धान्त और परम्परा का पतन था।

राष्ट्रीय दिवस 14 जुलाई


बास्तील के पतन की घटना का फ्रांस के इतिहास में विशेष महत्व है। आज भी स में अपना राष्ट्रीय दिवस 14 जुलाई को ही मनाया जाता है। फ्रांस के चूचों राजाओं "पुरान सफेद झंडे के स्थान पर लाल, सफेद तथा नीले रंग का नया झंडा अपना लिया पा बास्तील के पतन को एकतन्त्र की पराजय और स्वतन्त्रता की जीत समझा गया।

"सारे क्रान्ति काल में कारतोस के पास सो रखो और गपूर याहारे परिणामों शाले अन्य कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं हुई ...इस दुर के पहर को केवल कार में हो गयी अपितु सारे संसार में स्वादाता के सह-सन्म का परिचायक आणा गया।

व्यवस्था का कारण रह नहीं था। इसका कारण सो हुई और था उस पर शासन था जिन्होंने युळे तथा स्वारी आमोद-प्रमोद में इस का अपाध्याय किया। इस शासकों के विपरीत तुई सोलहों अपेक्षाकृत एक स्टार शासक था।

फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था

फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था


प्रत्येक वर्ग के भीतर विभिन्न श्रेणियों के बीच अधिकारों एवं सुविधाओं की दृष्टि से भारी विषमताएँ थीं । "फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था का आधार कोई विधान या कानून नहीं वरन् विशेषाधिकार, रियायतें और छूट थी। इस प्रकार की व्यवस्था के फलस्वरूप जनजीवन में संशय, अविश्वास एवं असंतोष ही पनप सकता था । यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि फ्रांस की कुल जनसंख्या के अनुपात में विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग के लोगों की संख्या एक प्रतिशत से अधिक नहीं थी। क्रान्ति से पूर्व फ्रांस की कुल जनसंख्या ढाई करोड़ थी, जिनमें से लगभग डेढ़ लाख पादरी और लगभग एक लाख चालीस हजार सामन्त थे।

विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग


इतनी कम जनसंख्या होते हुए भी उच्च वर्ग के लोग अधिकारी, सुविधाओं एवं जीवन स्तर की दृष्टि से शेष 99 प्रतिशत देशवासियों से बहुत आगे थे। अनुमान लगाया गया है कि जागीरदारों एवं चर्च के धर्माधिकारियों में प्रत्येक के पास फ्रांस की समस्त सम्पत्ति का पाचवाँ भाग था। फिर भी ये दोनों वर्ग कर से मुक्त थे और साधनहीन तृतीय वर्ग के लोगों को करों से लाद दिया गया था। इन दोनों वर्गों को प्रदत्त विशेषाधिकारों ने जनसामान्य को विरोधी बना दिया । अगर राजा विशेषाधिकार का प्रश्न हल कर देता और मध्यमवर्ग को उचित स्थान दिला देता, तो शायद क्रान्ति नहीं होती । नेपोलियन ने ठीक ही कहा था कि मध्यमवर्ग का अहंभाव ही क्रान्ति का असली कारण था; स्वतन्त्रता तो एक बहाना मात्र थी। इतिहासकार मेरियट का मत है कि “वास्तव में जब क्रान्ति हुई तो वह मुख्यतः राजा के निरंकुश एकतन्त्र के विरुद्ध नहीं, वरन् विशेषाधिकारों से युक्त वाँ-कुलीन व पुरोहित के विरूद्ध थी और क्रान्तिकारियों ने आरम्भ में उन्हीं को ही समाप्त किया "


(क) पादरी


फ्रांस की अधिकांश जनता रोमन कैथोलिक मतावलम्बी थी। अतः कै थोलिक चर्च का काफी प्रभाव था। उसका अपना देशव्यापी संगठन था। उसके पास अतुल सम्पत्ति थी और परम्परा के अनुसार वह राज्य के करों से मुक्त था। इसके साथ ही शिक्षा, जन्ममृत्यु के आंकड़े, विवाह एवं अन्य सामाजिक और धार्मिक संस्कारों आदि पर पादरियों का एकाधिकार-सा था। उसे पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं के अभिवेचन (सैंसर) करने का अधिकार था। चर्च के पृथक् न्यायालय और कानून थे। उसके व्यापक अधिकारों एवं प्रभाव के कारण ही यह कहा गया है कि फ्रांस का चर्च “राज्य के अन्दर राज्य” था।

फ्रांस की सम्पूर्ण जागीरी भूमि की बीस प्रतिशत भूमि चर्च के अधीन थी, जिससे चर्च की बहुत अधिक आय होती थी। इसके अलावा चर्च किसानों से सब प्रकार की फसलों पर धर्माश" (एक प्रकार का धार्मिक कर) भी वसूल करता था । अनुमानतः चर्च की वार्षिक आय राजकीय आय से आधी थी । यद्यपि चर्च इस आय का कुछ भाग धार्मिक कार्यों, जनहित तथा शिक्षा के प्रसार में खर्च करता था किन्तु चर्च के भीतर घोर पक्षपात एवं अपव्ययता का बोलबाला था । अठारहवीं शताब्दी में चर्च बहुत अधिक बदनाम एवं अलोकप्रिय हो गया था। लोगों की नजर में खटकने वाली बात यह थी कि चर्च की बढ़ती हुई सम्पदा के साथ पादरी अपने धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा करते जा रहे थे । चर्च की अलोकप्रियता का एक मुख्य कारण फ्रांस के मध्यम वर्ग के व्यक्तियों में लोकप्रिय होती हुई संशयवाद की प्रवृत्ति थी जिसके प्रभाव से ईश्वर का अस्तित्व तथा चर्च की उपयोगिता दानी ही विवाद के विषय बन गये थे। दूसरा कारण, चर्च के सामन्तीय अधिकार तथा उनका कठोरता से लागू किया जाना था जिसके कारण किसानों में चर्च के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न होने लगा।

पादरियों में भी दो श्रेणियाँ थीं-


() उच्च पादरी (1) सामान्य पादरी।

उच्च पादरी वग में आर्कबिशप, ऐबे आदि पद थे। ये प्रायः कुलीनों के पुत्र होते थे। इनकी आमदनी बहुत थी और ये शान-शौकत एवं आराम का जीवन बिताते थे।“ धार्मिक कार्यों में उनकी रुचि बहुत कम थी और उनमें से अधिकांश अपने धार्मिक कार्यक्षेत्र को छोड़कर राज दरबार में रहकर भोग विलास का जीवन व्यतीत करते थे। वे ईश्वर के अस्तित्व तक में विश्वास नहीं रखते थे। एक बार लुई सोलहवें ने पेरिस के आर्कबिशप की नियुक्ति करते समय कहा था- “कम से कम पेरिस में तो हमको एक ऐसा आर्कबिशप रखना है, जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखता हो ।" इस श्रेणी के लोग सामान्य पादरियों को हेय समझते थे। यह उच्च पुरोहित वर्ग धर्म के आदर्शों को भूलकर प्रष्ट एवं विलासमय जीवन । बिता रहा था, जिससे जनता में उनके प्रति श्रद्धा के स्थान पर असंतोष एवं विरोध की भावना बढ़ रही थी।

सामान्य पादरी वर्ग में हजारों स्थानीय गिरजाघरों के छोटे पादरी थे, जो प्रायः निम्न वर्ग या कृषक वर्ग से आते थे। वे जनसाधारण के सभी धार्मिक कार्य करते और उनके सुख-दुःख में सम्मिलित होते थे। किन्तु इनकी आय इतनी कम होती थी कि उससे कई बार इनके लिए जीवन निर्वाह करना कठिन हो जाता था। ये फटे-पुराने कपड़े पहनते थे। इनके मन में चर्च के उच्चाधिकारियों, जो उनकी अवहेलना करते थे और ठाठ-बाट से रहते थे, के प्रति घृणा एवं आक्रोश का होना स्वाभाविक था। यथार्थ में इस श्रेणी के पादरी जनसाधारण के अधिक निकट थे और प्रचलित अन्यायपूर्ण व्यवस्था के दोषों से परिचित थे। इसी कारण उन्होंने क्रान्ति के समय जनता का समर्थन किया और उसे सफल बनाने में काफी सहयोग दिया।"


(ख) कुलीन वर्ग


यद्यपि कार्डिनल रिशलू और बाद में लुई चौदहवें (1643-1715 ई.) ने सामन्तों की शक्ति का अन्त करके उन्हें बहुत से अधिकारों से वंचित कर दिया था, फिर भी इस वर्ग को अभी भी बहुत सुविधायें तथा अधिकार प्राप्त थे। राज्य, चर्च तथा सेना के सभी उच्च पद इसी वर्ग के हाथों में थे और फ्रांस की समस्त भूमि का पाँचवाँ भाग उनके अधिकार में था।

अठारहवीं शताब्दी के कुलीन वर्ग की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि उसमें एकात्मकता एवं समरूपता का अभाव था। वंश की प्राचीनता, सामाजिक कार्यों का स्वरूप, राज दरबार के साथ सम्बन्ध आदि के आधार पर कुलीन वर्ग अनेक उपवर्गों में विभाजित था। अभिजात एवं प्राचीन वंशों के सामन्त राजकृपा प्राप्त नवोदित कुलीनों को, सैनिक पदों पर अधिकार रखने वाले कुलीन नागरिक प्रशासन के पदाधिकारी कुलीनों को तथा दरबारी कुलीन प्रान्तीय कुलीनों को हेय दृष्टि से देखते थे। इन विमित्रताओं के मध्य कुलीन वर्ग के सदस्य इस मायने में समान थे कि उन्हें समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त था। यह स्थान इस मान्यता पर आधारित था कि वे सामन्तीय भू-स्वामी हैं जो सरकार के कार्यों में हाथ बंटाते हैं, युद्ध में राजा की सेवा करते हैं तथा प्रामीण क्षेत्रों में कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने का उत्तरदायित्व उठाते हैं। अपनी इस विशिष्ट स्थिति के कारण कुलीन वर्ग के सदस्य करों से मुक्त थे तथा राज्य के विभिन्न पदों पर आसीन थे।

अमेरिका स्वातन्त्रय युद्ध की वास्तविक महत्ता

अमेरिका स्वातन्त्रय युद्ध की वास्तविक महत्ता


वह अपने पूर्वज जॉज का शासक नहीं रहना चाहता था। वह था। वह उपनिवेशों पर का खर्च वह अमेरिका से स्कूल साथ एक अयोग्य व्यक्ति साबित का साथ नहीं रख पाया। अमेरिकी मामला का मामलों के मन्त्री मन ने इंग्लैण्ड में बैठे-बैठे ही युद्ध संचालन करने का प्रयास किया और समय-समय पर नये आदेश देकर सेनापतियों को खिन्न कर दिया। वाशिंगटन के योग्य एवं कुशल नेतृत्व ने भी उपनिवेशवासियों की सफलता में योग दिया । वाशिंगटन उच्च लक्ष्य रखने वाला चरित्रवान नेता था जिसने अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में अमेरिकी क्रांति का सफल नेतृत्व किया । उपनिवेशवासियों का उसमें दृढ़ विश्वास था। उसने अपने सैनिक नेतृत्व में राष्ट्र के आत्मविश्वास को बनाए रखा।

इंग्लैण्ड के सेनानायकों तथा सैनिकों का बड़ा योगदान


उपनिवेशवासियों की सफलता के कारणों में इंग्लैण्ड के सेनानायकों तथा सैनिकों का बड़ा योगदान रहा । उपनिवेशों में लड़ रही सेना में भर्ती किये गये यूरोप के भाड़े के सिपाहियों से कोई आशा नहीं की जा सकती थी। अंग्रेज सेनानायकों ने भी अनेक मूलें की। हो (हॉव) तथा बर्गोइन आरामतलब सेनानायक थे तथा उन्होंने अनेक बार हाथ में आये अवसरों को खोया एवं कभी भी पूरी निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया।

फ्रांस के युद्ध में खुले रूप से शामिल हो जाने से उपनिवेशों के पक्ष में पलड़ा भारी हो गया। बाद में स्पेन, हॉलैण्ड द्वारा उपनिवेशों की सहायता के निश्चय ने भी इंग्लैण्ड की स्थिति को कमजोर बनाया । इन राष्ट्रों की जल सेना ने इंग्लैण्ड की जल सेना को काफी परेशान किया और इंग्लैण्ड के लिए अमेरिका स्थित अपनी सेनाओं को सामान पहुँचाना कठिन बना दिया । फ्रांसीसियों के सहयोग से ही वाशिंगटन ने यार्क टाउन में लार्ड कार्नवालिस को आत्मसमर्पण के लिए विवश किया ।

अंग्रेजी सेना छापामार युद्ध से निपटने में योग्य नहीं थी और अमेरिकी युद्ध मुख्यतः इस पद्धति से लड़ा गया । वास्तव में जॉर्ज वाशिंगटन को केवल कुछ सामरिक केन्द्रों की सुरक्षा करनी पड़ी जबकि कार्नवालिस तथा हो को एक पूरे महाद्वीप को जीतना था । लार्ड नॉर्थ व जॉर्ज तृतीय ने इस अन्तर को ठीक से नहीं समझा।


क्रांति का स्वरूप


अमेरिका की इस क्रांन्ति का स्वरूप मुख्यतः मध्यवर्गीय था। अमेरिका के मध्यवर्गीय लाग अत्यन्त उदार एवं प्रगतिशील थे। यह जाग्रत वर्ग था जिसमें राजनीतिक चेतना का अभाव नहीं था । यह वर्ग उपनिवेशी शासकों के विशेष अधिकारों और सुविधाओं से घृणा करता था। यह वर्ग सामाजिक समानता की माँग करता था और अपने राजनीतिक पकारा को मान्य बनाना चाहता था। इस वर्ग में निराशा व असंतोष की भावना थी सह संघर्ष करके मिटाना चाहता था। प्रारम्भ में यह वर्ग भी उपनिवेशों में सच्चे अथा जातन्त्रको स्थापना का लक्ष्य रखता था और मात-राज्य से विणेह नहीं चाहता था।

स वर्ग में जब यह चेतना उत्पन्न हई कि उपनिवेशी शासकों तथी स्वाथी वा का कामात इंग्लैण्ड में है तो इस वर्ग में सम्पूर्ण उपनिवेशी स्वायत्त सरकार की स्थापना व्य बनाया। इसके लिए अठारहवीं सदी के अन्तिम तीन दशकों में पढ़े-लिखे लोगों. व्यवसायियों तथा किसानों ने प्रयास किया। इस सबका यह तात्पर्य नहीं है ति में नगरों के साधारण मेकेनिकों साधारण ने संग्राम को उपेक्षा की राम वर्ग ने ही किया। इसका स्पष्ट लोगों ने हस्ताक्षर किये थे, उनमें केवल वकील थे ।

संविधान परिषद


कि सर्वसाधारण ने संग्राम में भाग नहीं लिया। क्रान्ति में नगरों ने तथा मिस्त्रियों ने खुलकर भाग लिया । निःसन्देह सर्वसाधारण ने संया दष्टि से नहीं देखा किन्तु संग्राम का पथ-प्रदशन मध्यम वर्ग ने ही किया। इस प्रमाण यह है कि स्वतन्त्रता के घोषणा पत्र पर जितने लोगों ने हस्ताक्षर किये अधिकांश लोग मध्यम वर्ग के ही थे। उनमें आधे तो केवल वकील थे। संवि में भी मध्यम वर्ग के व्यक्तियों का बोलबाला था । अतः जो संविधान बना, उसन पूर्ण जनतन्त्र राज्य कायम नहीं हुआ । जन-साधारण को मताधिकार से वंचित रखा स्त्रियों, नीग्रो तथा बहुत से रवतो को भी मताधिकार नहीं मिला। इतिहासकार र क्रिस्टोल ने यह मत व्यक्त किया है कि अमेरिकी क्रांति फ्रांसीसी क्रान्ति की भाँति आधनिक नहीं थी क्योंकि इस क्रांति ने जन-साधारण को भविष्य के प्रति आश्वासन तो नहीं दिया परन्तु जन-साधारण को सुखमय जीवन का लक्ष्य बोध प्राप्त करने की प्रेरणा अवश्य दी

एक बात और, अमेरिकी क्रान्ति में एक वर्ग-संघर्ष देखा जा सकता है जिसमें एक ओर, इंग्लैण्ड का कुलीन शासनवर्ग था जिसके समर्थन में स्वयं अमेरिका का धनी वर्ग था, जो प्रजातन्त्र के आगमन और उसकी प्रतिक्रियाओं से भयभीत तो था। दूसरी ओर अमेरिका के परिश्रमी, मध्यम व उच्च वर्ग के लोग थे ।


अमेरिकी क्रान्ति का महत्व


अमेरिका स्वातन्त्रय युद्ध की वास्तविक महत्ता न तो स्पेन या फ्रांस के प्रादाराक लाभी, न हॉलैण्ड की व्यापारिक क्षतियों तथा इंग्लैण्ड के साम्राज्य की अवनति न वरन् इसकी वास्तविक महत्ता अमेरिकी क्रान्ति के सफल सम्पादन में पाई जा अमेरिका की क्रान्ति विश्व इतिहास की प्रमुख घटनाओं में एक है। इस जा सकता है। आधुनिक मानव की प्रगति में अमेरिका का का
आ में एक है। इस क्राति का महत्व
कई दृष्टियों से आंका जा सकता है । आधुनिक मानव काम एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है। इस क्रान्ति के फलस्वरूप नई दुनिया एक राष्ट्र का जन्म हुआ वरन् मानव जाति की दृष्टि से एक नये युग का अमेरिका की यह क्रान्ति कार्ल एल. बेकर के अनुसार, "एक नहा आप फलस्वरूप नई दुनियों में न केवल क नये युग का आरम्भ हुआ। एक नहीं अपितु दो क्रान्तियों का निवेशों में ब्रिटेन के विरुड का कारण उपनिवेशों व ब्रिटेन के मध्य आर्थिक सम्मिलन थी। प्रथम, 'बाह्य क्रान्ति था जिसका विद्रोह किया गया तथा जिसका कारण उपनिदेशाप संघर्ष था। द्वितीय, 'आन्तरिक क्रान्ति' थी, जिसका प्रया के भविष्य की रूपरेखा तैयार करना था।" क्रान्ति ने संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनीतिक ही. इसके अतिरिक्त वहाँ के सामाजिक, धार्मिक आरसा कर दी । क्रान्ति के द्वारा अमेरिकी जनता को एक पारव जिसमें परम्परा, धन और विशेषाधिकारों का महत्व महत्व अधिक ।

विशेषाधिकारों का तीन प्रमुख दिशाआ पश्यात् जनतन्त्र को काफी प्रोत्साहन मिला-अथर्थात् पर ता के पश्चात् अमेरिका अनारका के राजनीतिक जीवन को एक नया मान जक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन की भी का का एक परिवर्तित सामाजिक अवस्था । का महत्व कम था और मानवीय समानता क नया मोड़ तो दिया का भी कायापलट अवस्था प्राप्त हुई दशाओं में सफल अधिक्रमण करन मात् परम्परागत साम्पत्तिक अधिकार

Wednesday, September 18, 2019

गवर्नरों की मान-हानि अधिकारों के प्रयोग पर बंधन

गवर्नरों की मान-हानि अधिकारों के प्रयोग पर बंधन


ऐसी स्थिति में न काम था। विधायक 200 का विरोध करना बहुत कठिन काम था। कार्यकारिणी समिति तो सम्राट के अन्तर्गत थी, परन्तर अधिकार आप्रवासियों द्वारा चुने हुए विधायक-सदन के गवर्नरों के लिए जनता के प्रतिनिधियों का विरोध करना सदनों की यह इच्छा कि कार्यकारिणी पर उनका नियन्त्रण स्था ही थी। इस अधिकार को प्राप्त करने के उद्देश्य से ही विधायक बाण स्थापित हो जाए, स्वाभाविक भी विधायक सदन अक्सर गवर्नरी तेथे। यह रवैया अंग्रेज सरकार सदनों की यह कार को प्राप्त भाग अस्वीकृत कर की मान-हानि होती थी वरन उनके और जजों के वेतन की धनराशि की माँग अस्वीकृत कर देते थे। यह को बुरा लगता था क्योंकि इससे न केवल गवर्नरों की मान-हानि अधिकारों के प्रयोग पर बंधन भी लग जाता था। इस प्रकार सा जाता था। इस प्रकार शासक और शासित की दोनों ही एक दूसरे से असंतुष्ट थे और उनके बीच तनाव व्याप्त था।

(6) सप्तवर्षीय युद्ध का प्रभाव


उपनिवेशों के लिए जो संघर्ष हुआ उसकी अन्तिम कड़ी विश्वव्यापी सप्तमी (1756-63 ई.) युद्ध था जो कि मध्य यूरोपीय देशों के अतिरिक्त इंग्लैण्ड और फ्रांस बीच यूरोप, अमेरिका और भारत में लड़ा गया था। इस युद्ध के व्यापक प्रमाव पड़े। इस युद्ध के दौरान अमरीकियों ने अंग्रेजी सेना को विशेष सहायता नहीं दी। इतना ही नहीं कई बार तो अंग्रेज सेना के लिए आई रसद इत्यादि को लूटकर उसे चोरी-छुपे फ्रांस की सेना को बेचा। इसके अतिरिक्त वे फ्रांस से व्यापार करते रहे। युद्ध-काल में उपनिवेशियों को बहुत लाभ हुए। कुछ उद्योग धन्धों के विकास के लिए अवसर मिला | न्यूयार्क के एक गवर्नर ने भविष्यवाणी की थी कि “यदि एक बार अमेरिकी अपनी जरूरत का कपड़ा इत्यादि स्वयं उपलब्ध करने में सफल हो गये तो वे अमेरिका में इंग्लैण्ड का पा को बिल्कुल स्वीकार नहीं करेंगे।" किसानों को अधिक मूल्य पर पैदावार मजदूरी को पर्याप्त मजदूरी पाने का मौका मिला। किन्त यद का अन्त होते हाय युद्धकालीन लामों से वंचित हो गये और अपने संकट को दूर करने का उपाय सप्तवर्षीय युद्ध के बाद इंग्लैण्ड ने कनाडा पर कब्जा कर लिया आर उत्तर से फ्रांसीसी खतरा खत्म हो गया।


इंग्लैण्ड ने कनाडा पर कब्जा


इस प्रकार जो एकमात्र था वह भी हट गया। यह स्मरणीय है कि अमेरिकी उपनिवेशवासियों का का अन्त होते ही ये लोग करने का उपाय सोचने लगे लिया और अमेरिका में मात्र अंकुश अमरीकियों पर वासियों को कनाडा में रहने वाले फ्रांसीसियों से हमेशा आक्रमण का भय बना रहता था लिए इंग्लैण्ड पर आश्रित रहना पड़ता था। अब इंग्लैण्ड के साथ बंधे रहने में कोई लाभ नहीं है। अर के रूप में एकदम परिवर्तन आ गया और उन्होंने इल मत रहना पड़ता था। अब अंग्रेज बस्तियों ने अनुन बना रहता था और इन्हें अपनी सुरक्षा और उन्होंने इंग्लैण्ड की शक्ति की अव 'कर दी। इस युद्ध का परिणाम यह भी हुआ कि उपनिवेशा क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों के साथ बड़ी योग्यता स भाग लेकर उन्होंने यह सीख लिया था कि किस प्रका एक सह-उद्देश्य के लिए युद्ध किया जा सकता है। । न अनुभव किया कि प युद्ध के बाद बस्तियों केकी अवहेलना शुरु उपनिवेशों को अपनी शक्ति का अनुम याग्यता से काम किया था। इस
॥ कि किस प्रकार सेनायें और साधन का अनुभव हुआ था। इस संघर्ष में साधन संगठित करके सप्तवर्षीय युद्ध के बाद इंग्लैण्ड ने मिसिसिपी नदी से लेकर अलगानी पर्वतमाला के व्यापक क्षेत्र को अपने नियन्त्रण में ले लिया था।

अमेरिकी बस्तियों के निवासी


अपनी सीमायें पश्चिम की ओर बढ़ाना चाहते थे और इस क्षेत्र में रहने वाले मूल निवासियों को खदेड़ देना चाहते थे। यही कारण था कि सारी पश्चिमी सीमा पर 1763-64 में मल निवासियों ने विद्रोह कर दिया और बड़े पैमाने पर रक्तपात हुआ। उत्तरी अमेरिका के रेड-इण्डियनों को शुरू से ही अंग्रेजों से घृणा थी। वे फ्रांसीसियों को अधिक पसन्द करते थे। दूसरी ओर उपनिवेशी इस विशाल विजित क्षेत्र में अपनी तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ स्वयं लाभ उठाने पर आतुर थे । इस प्रकार यहाँ इंग्लैण्ड की सरकार का उपनिवेशों के स्वार्थ से संघर्ष हो गया । नयी भूमि की आवश्यकता के कारण विभिन्न उपनिवेशों ने दावा किया कि पश्चिम में मिसिसिपी नदी तक अपनी सीमा बढ़ाने का उन्हें अधिकार है। इंग्लैण्ड की सरकार की मान्यता थी कि रेड-इण्डियनों को शान्त होने के लिए थोड़ा समय देना चाहिए अन्यथा युद्धों का सिलसिला प्रारम्भ हो सकता था। इसलिए 1763 ई. में एक शाही घोषणा द्वारा ऐलेगनीज, फ्लोरिडा, मिसिसिपी और क्वेबेक के बीच का समूचा क्षेत्र रेड-इण्डियनों के लिए सुरक्षित कर दिया गया । इससे उपनिवेशवासियों का पश्चिम की ओर प्रसार रुक गया और वे इंग्लैण्ड की सरकार को अपना शत्रु समझने लगे।

(7) उपनिवेशों का आर्थिक शोषण


इंग्लैण्ड उपनिवेशों का अधिक से अधिक आर्थिक शोषण करना चाहता था परन्तु उपनिवेशी उसे सहन करने को तैयार नहीं थे। वे चाहते थे कि हम स्वयं अपने व्यवसायों तथा उद्योगों का प्रसार करें । इंग्लैण्ड को लाभ पहुंचाने में उनकी रुचि नहीं थी। दूसरी तरफ इंग्लैण्ड की सरकार यह चाहती थी कि उपनिवेश उनके धन एवं सत्ता की वृद्धि में सहयोग देते रहें। ब्रिटिश सरकार ने उपनिवेशों से व्यापार सम्बन्धी ऐसे कानून पास किए जिनसे इंग्लैण्ड को लाभ पहुँचता था । इन कानूनों को तीन समूहों में विभक्त किया जा सकता है: __(


1) नौ-संचालन कानून-


इंग्लैण्ड ने ऐसे नौ-संचालन कानून पारित किये जिनके बारा 1651 में यह व्यवस्था की गई कि उपनिवेशों में व्यापार-कार्य केवल इंग्लैण्ड, आयरलण्ड, तथा स्वयं उपनिवेशों के जहाजों के माध्यम से ही हो सकता था। इस नियम "लण्ड के पोत-निर्माण उद्योग का ही विकास हुआ ।

नौ-संचालन कानून के अन्तर्गत यवस्था की गई कि सभी प्रकार के कच्चे माल को, जिसकी इंग्लैण्ड को आवश्यकता बिना इग्लेण्ड के बन्दरगाहों पर लाये उपनिवेशों से दूसरे स्थानों पर निर्यात्त नहीं जा सकता था। इससे इंगलैण्ड के वाणिज्यवादी हितों को लाभ पहुंधा अर्थात् १ व्यापारियों को दलाली का लाभ हुआ और इंग्लैण्ड की गृह सरकार को दुबारा उद्देश्य से 1663 ई. में एक गये माल पर राजस्व की प्राप्ति हुई। इंग्लैण्ड ने अपने व्यापारवादी हितों के 1663 ई. में एक अन्य नौ-परिवहन कानून के द्वारा यह व्यवस्था की कि यूरोप हले इंग्लैण्ड के बन्दरगाहों तथा व्यापारी बेड़ों के मालिक स्पष्ट है कि ये कान यह वस्तुएँ थीं-चादर से अमेरिकी उपनिवेशों में निर्यात किया जाने वाला मा लाया जायेगा। इस कानून से भी इंग्लैण्ड के व्यापारियों तथा या
अमेरिकी उपभोक्ताओं की कीमत पर लाभ होता था। स्पष्ट उपनिवेशवासियों के लिए अन्यायपूर्ण थे।

व्यापारिक अधिनियम-


इन नियमों के अनुसार अमेरिकी उपनिवेशों के कर वस्तओं का निर्यात केवल इंग्लैण्ड को ही किया जाना था।

राजतन्त्र के पश्चाताप का युग

राजतन्त्र के पश्चाताप का युग


यह युग 'राजतन्त्र के पश्चाताप का युग' कहलाता है । अब निरंकुश, स्वेच्छाचारी, स्वार्थी, क्रूर एवं दमनशील राजत्व के स्थान पर उदार, लोकहितकारी, प्रबुद्ध व सर्वसाधारण के कल्याण हेतु राजत्व की स्थापना हुई । अब सार्वभौम राज्यों ने राजवंशीय हितवृद्धि के स्थान पर लोक-कल्याण के उद्देश्य को अपनाया | अब शासकों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के स्थान पर मानवता की विजय होने लगी। अब भी राजत्व निरंकुश था, परन्तु वह प्रबुद्ध निरंकुश राजत्व था। अब राजनीति पर प्रबोध लेखकों एवं विचारकों की छाप दिखाई देने लगी थी। अब जनसाधारण की शिक्षा की उन्नति, कृषक दासों का उत्थान, साहित्य का विकास, कठोर दण्ड-विधान में सुधार, निर्धनता का उन्मूलन, चिकित्सालयों का निर्माण, कानूनों का स्पष्टीकरण एवं सुधार तथा उनका संकलन इत्यादि महत्वपूर्ण परिवर्तन होने लगे।"

निर्धनता का उन्मूलन


रूस की साम्राज्ञी कैथराइन द ग्रेट (1762-1796 ई.) भी एक ऐसी ही शासिका थी, जिसने नये युग की प्रवृत्तियों से प्रभावित होकर अपने देश के शासन में अनेक महत्वपूर्ण सुधार किये । फ्रांस के प्रगतिशील विचारकों के साथ उसका घनिष्ट सम्बन्ध था । दिदरो का उसने रूस आमन्त्रित किया था और वाल्तेयर के साथ उसका पत्र-व्यवहार था। फ्रांस प्रकाशित विश्वकोश को वह ध्यानपूर्वक पढ़ती थी और सुधारों के लिए प्रेरणा उसने यविचारकों से ही प्राप्त की थी। चर्च की बहुत सी सम्पत्ति को उसने जन्त कर लिया और इस सम्पत्ति का उपयोग विद्यालयों की स्थापना और शिक्षा प्रसार के लिए किया। स्फ्यू के विचारों से प्रभावित होकर उसने एक राष्ट्रीय सभा का भी निर्माण किया था, 1 जनता के विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था। उसका मत था कि राज्य की शासक के लिए नहीं होती अपित शासक की सत्ता राज्य के लिए होती है।


चिकित्सालयों का निर्माण


वह  का विरोधी थी और यह मानती थी कि व्यक्तियों को उन सब कार्यों को करने त्रता होनी चाहिए, जो कानून द्वारा निषिद्ध न हों। इस सबके बावजूद उसकी मात का मुख्य आधार अपना निरंकुश शासन बनाए रखना था। सामन्तीकन रहा कुलीन वर्ग सम्बन्धी न्यायिक फैसले कुलीन वर्ग के ही व्यक्तियों जा सकते थे। कषि-दासों पर उत्पीड़न जारी रहे। कृषि-दासों को, जिनका
आन्तरिक नीति का मुख्य आ द्वारा किए जा सकते थे। ही मिला। 1773 ई. में हुए कि रणों को दूर करने की कि संख्या आबादी की आधी से अधिक थी, कुछ भी नहीं मिला। के विद्रोह को दबा दिया गया किन्तु विद्रोह के सामाजिक कारणों को चिंता नहीं थी। की गणना प्रबोध शासको अध्ययन किया था। उसे वाली चर्च के वर्चस्व का अन्त कर कोई भी आदेश तब तक आस्ट्रिा
आस्टिया के सम्राट जसिफ द्वितीय (1765-17903) की पर की जाती है। उसने दर्शन का गहन अध्ययन किया था।

कानूनों का स्पष्टीकरण एवं सुधार


तर्कपूर्ण सिद्धान्तों के आधार पर अपने साम्राज और रूसो से बड़ा लगाव था । वह तर्कपूर्ण सिद्धान्तों के आधार शासन व्यवस्था का पनर्निर्माण करना चाहता था। रोम के चर्च के की दृष्टि से उसने यह आज्ञा प्रसारित की कि पोप का कोई भी आदेश साम्राज्य में प्रचारित न किया जाए जब तक ऐसा करने के लिए सम्राट न कर ली जाए । पादरियों को राजकीय स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने के आदेश गए । यूरोप में पहली बार यहूदियों को भी कैथोलिकों के समान धार्मिक एवं राज अधिकार प्रदान किए गये। 1765 से लेकर 1769 ई. तक ऐसे अनेक उपाय अपनाए जिनके फलस्वरूप चर्च और अधिक भूमि प्राप्त नहीं कर सके | धर्म संघों में प्रदेश पर के इच्छुक व्यक्तियों की संख्या नियंत्रित कर दी गई, धर्म संघों को अपना आय-व्यय का लेखा-जोखा शासन के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए बाध्य किया गया। सरकार ने घर और धर्मसंघों की भूमि पर कर लगाया ।

जिन मठों ने शिक्षा, चिकित्सा, वृद्धों की देखभात करने जैसे क्षेत्रों में कोई उपयोगी सामाजिक कार्य नहीं किया और जिन्होंने अनार्जित आ के आधार पर केवल मठवासियों को ध्यान-प्रार्थना का जीवन बिताने की व्यवस्था की तथा जिन्होंने अत्यन्त वैभवपूर्ण मठ-भवन बनवाए, उन पर निषेधाज्ञा जारी कर दा गई मिलाकर 700 मठों का दमन किया गया और कल 65.000 में से 38,000 पेंशनभोगी बनाकर उन्हें मठ त्यागने के लिए विवश किया। जनहित के सुधार सम्राट ने अर्धदासों को स्वतन्त्र करने का आदेश दिया | उसने दीवाना और कानून संकलित करवाए । न्याय व्यवस्था कम खर्चीली और सरल बनाई गई नाम पर उत्पीड़न की परम्परा समाप्त कर दी गई और मृत्युदण्ड मा लगे । शिक्षा में अनेक महत्वपूर्ण पद प्रबोधन आन्दोलन के समथका पूर साम्राज्य को एक राष्ट्र बनाने की असफल कोशिश की।


कैथोलिकों के समान धार्मिक एवं राज अधिकार


यह दुःखद हत के सुधारों के क्षेत्र विानी और फौजदारी तरल बनाई गई। सजा ण्ड भी बहुत कम दिए जाने समर्थकों को दिए गए । उता दुःखद तथ्य रहा नगा तो उसे बहुत क्षोभ हुआ धारण के बीच सम्पर्क उसकी नीतियों को समर्थन नहीं मिला, उल्टे विरोध होने लग विशेषाधिकार प्राप्त दर्गा का विरोध, नौकरशाही और जन-साधारण अभाव और एक साथ अनेक संस्थाओं को सुधारने का प्रया समन्वय का अभाव आदि उसकी असफलता के कारण था ने अपने अधिकांश सुधारों को समाप्त करने की आज्ञा ददा प्रशा का राजा फ्रेडरिक द्वितीय (1740-1786ई.) की गणन जाती है। उसने अठारहवीं शताब्दी में हए परिवर्तनों का अध्यय उसका पत्र-व्यवहार था और शासक होने के बाद वाल्तेयर उस की तरह कुछ दिन रहा भी। उसमें धार्मिक सहिष्णुता. उदार । का प्रयत्न, आदर्श और यथाभ धर्म पहले निराश शाही प्रमा थी उस का अध्ययन किया था। वाला पाल्तयर उसके दरबार में अभिन ता, उदारता, विचारों की विशाल "7 शासकों में। था। वाल्लेया पार में अभिन्न किन लोक-कल्याण की इच्छा विद्यमान थी।

लोक-कल्याण की इच्छा


वह अत्यधिक परिश्रमी था | लुई की तरह भोग-विलास और प्रदर्शन में उसकी रुचि नहीं थी। अपव्यय को वह अपराध मानता था। वह जोसेफ की तरह आदर्शवादी भी न था । इंग्लैण्ड के संवैधानिक राजतन्त्र और फ्रांस के स्वेच्छाचारी राजतन्त्र के बीच उसने अपने राजत्व के सिद्धान्त का निर्धारण किया । उसने अपनी जागीर से भूमि-दास प्रथा का अन्त कर दिया था। वह चाहता था कि प्रशा के अन्य बड़े जागीरदार भी इस प्रथा का अन्त कर दें। पर इसमें उसे सफलता न मिली। आंतरिक क्षेत्र में उसने जमींदारों और किसानों को वैज्ञानिक ढंग से खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया। पहली बार आलू की खेती बड़े पैमाने पर शुरू हुई। धर्म के क्षेत्र में फ्रेडरिक महान् सहिष्णुता की नीति का पोषक था । उसका मन्तव्य था कि प्रत्येक व्यक्ति को धर्म के मामले में स्वतन्त्र होना चाहिए | उसकी प्रजा के बहुसंख्यक लोग प्रोटेस्टेन्ट चर्च के अनुयायी थे किन्तु उसने रोमन कैथोलिक लोगों को भी अपने विचारों के अनुसार चर्च स्थापित करने की अनुमति दे दी। उसके प्रजा-प्रेम का उदाहरण उसकी न्याय-विषयक तत्परता से प्रकट होता है।

Monday, September 2, 2019

न्याय के क्षेत्र में अव्यवस्था एवं अष्टाचार

न्याय के क्षेत्र में अव्यवस्था एवं अष्टाचार


शासन के अन्य अंगों की भाँति कानून और न्याय के क्षेत्र में अव्यवस्था एवं अष्टाचार व्याप्त था। देश में कानूनों की कोई एक प्रामाणिक संहिता नहीं थी। पूरे देश में लगभग 385 प्रकार के न्याय-विधान प्रचलित थे। "एक कस्बे में जो बात कानूनी और सही मानी जाती थी वही बात उस स्थान से 5 मील की दूरी पर स्थित दूसरे कस्बे में गैर कानूनी समझी जाती थी।" फ्रांस में प्रचलित कानूनों की भिन्नता के सम्बन्ध में प्रसिद्ध प्रबुद्धवादी विचारक वाल्तेयर ने कहा था "किसी व्यक्ति को फ्रांस में यात्रा करते समय सरकारी कानून उसी प्रकार बदलते हुए मिलते हैं, जिस प्रकार उसकी गाड़ी के घोड़े बदलते हैं।" वहाँ कौन-सा कानून लागू होगा कोई नहीं जानता था।

न्यायालयों के क्षेत्राधिकार


देश में कई प्रकार के न्यायालय थे किन्तु इन न्यायालयों के क्षेत्राधिकार अस्पष्ट थे। अतः यह ज्ञात करना मुश्किल था कि कौन से न्यायालय में किस विवाद का निर्णय होगा। न्यायिक पदों को बेचने की परम्परा से न्यायिक व्यवस्था बदतर हो गई थी। पैसे पर आधारित व्यवस्था में तीसरे वर्ग के लोग तो न्याय की आशा ही नहीं कर सकते थे। राजा की विशेष मुद्रा वाले पत्रों द्वारा किसी भी व्यक्ति को बिना अभियोग के जेल में डाल दिया जाता था । दिदरो और वाल्तेयर जैसे विचारकों को बास्तील के दुर्ग में कैद की सजा भुगतनी पड़ी थी। दण्ड व्यवस्था कठोर एवं पक्षपातपूर्ण थी। कुछ अपराधों के लिए कुलीन वर्ग के लोगों को किसी प्रकार की सजा नहीं मिलती थी। किसी-किसी मामले में जागीरदार न्यायाधीश का काम करने के साथ-साथ वादी अथवा प्रतिवादी का काम भी कर सकता था। न्याय प्रणाली की एक बुराई यह भी थी कि अदालतों की भाषा लैटिन थी जिसे फ्रांसीसी भाषा जानने वाली आम जनता समझ न पाती थी। सामाजिक व्यवस्था काशन फ्रांसीसी समाज विषम एवं विघटित था ।


सामन्तवादी पद्धति, असमानता और विशेषाधिकार के मूलभूत सिद्धान्तों


वह सामन्तवादी पद्धति, असमानता और विशेषाधिकार के मूलभूत सिद्धान्तों पर आधारित था। समाज मुख्यतः तीन दर्गों में विभक्त था-पादरी, कुलीन वर्ग और सर्वसाधारण वर्ग। उच्च पादरी (प्रथम एस्टेट) एवं कुलीन (द्वितीय एस्टेट) सुविधा प्राप्त वर्ग थे और कृषक, मजदूर तथा मध्यम श्रेणी के लोग (तृतीय एस्टेट) सुविधाहीन वर्ग में थे। प्रत्येक वर्ग के भीतर विभिन्न श्रेणियों के बीच अधिकारों एवं सुविधाओं की दृष्टि से भारी विषमताएँ थीं । "फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था का आधार कोई विधान या कानून नहीं वरन् विशेषाधिकार, रियायतें और छूट थी। इस प्रकार की व्यवस्था के फलस्वरूप जनजीवन में संशय, अविश्वास एवं असंतोष ही पनप सकता था ।

फ्रांस की कुल जनसंख्या के अनुपात में विशेषाधिकार


यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि फ्रांस की कुल जनसंख्या के अनुपात में विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग के लोगों की संख्या एक प्रतिशत से अधिक नहीं थी। क्रान्ति से पूर्व फ्रांस की कुल जनसंख्या ढाई करोड़ थी, जिनमें से लगभग डेढ़ लाख पादरी और लगभग एक लाख चालीस हजार सामन्त थे। इतनी कम जनसंख्या होते हुए भी उच्च वर्ग के लोग अधिकारी, सुविधाओं एवं जीवन स्तर की दृष्टि से शेष 99 प्रतिशत देशवासियों से बहुत आगे थे। अनुमान लगाया गया है कि जागीरदारों एवं चर्च के धर्माधिकारियों में प्रत्येक के पास फ्रांस की समस्त सम्पत्ति का पाचवाँ भाग था। फिर भी ये दोनों वर्ग कर से मुक्त थे और साधनहीन तृतीय वर्ग के लोगों को करों से लाद दिया गया था।

इन दोनों वर्गों को प्रदत्त विशेषाधिकारों ने जनसामान्य को विरोधी बना दिया । अगर राजा विशेषाधिकार का प्रश्न हल कर देता और मध्यमवर्ग को उचित स्थान दिला देता, तो शायद क्रान्ति नहीं होती । नेपोलियन ने ठीक ही कहा था कि मध्यमवर्ग का अहंभाव ही क्रान्ति का असली कारण था; स्वतन्त्रता तो एक बहाना मात्र थी। इतिहासकार मेरियट का मत है कि “वास्तव में जब क्रान्ति हुई तो वह मुख्यतः राजा के निरंकुश एकतन्त्र के विरुद्ध नहीं, वरन् विशेषाधिकारों से युक्त वाँ-कुलीन व पुरोहित के विरूद्ध थी और क्रान्तिकारियों ने आरम्भ में उन्हीं को ही समाप्त किया "

(क) पादरी


फ्रांस की अधिकांश जनता रोमन कैथोलिक मतावलम्बी थी। अतः कै थोलिक चर्च का काफी प्रभाव था। उसका अपना देशव्यापी संगठन था। उसके पास अतुल सम्पत्ति थी और परम्परा के अनुसार वह राज्य के करों से मुक्त था। इसके साथ ही शिक्षा, जन्ममृत्यु के आंकड़े, विवाह एवं अन्य सामाजिक और धार्मिक संस्कारों आदि पर पादरियों का एकाधिकार-सा था। उसे पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं के अभिवेचन (सैंसर) करने का अधिकार था। चर्च के पृथक् न्यायालय और कानून थे। उसके व्यापक अधिकारों एवं प्रभाव के कारण ही यह कहा गया है कि फ्रांस का चर्च “राज्य के अन्दर राज्य” था।


फ्रांस की सम्पूर्ण जागीरी भूमि


फ्रांस की सम्पूर्ण जागीरी भूमि की बीस प्रतिशत भूमि चर्च के अधीन थी, जिससे चर्च की बहुत अधिक आय होती थी। इसके अलावा चर्च किसानों से सब प्रकार की फसलों पर धर्माश" (एक प्रकार का धार्मिक कर) भी वसूल करता था । अनुमानतः चर्च की वार्षिक आय राजकीय आय से आधी थी । यद्यपि चर्च इस आय का कुछ भाग धार्मिक कार्यों, जनहित तथा शिक्षा के प्रसार में खर्च करता था किन्तु चर्च के भीतर घोर पक्षपात एवं अपव्ययता का बोलबाला था । अठारहवीं शताब्दी में चर्च बहुत अधिक बदनाम एवं अलोकप्रिय हो गया था। लोगों की नजर में खटकने वाली बात यह थी कि चर्च की बढ़ती हुई सम्पदा के साथ पादरी अपने धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा करते जा रहे थे । चर्च की अलोकप्रियता का एक मुख्य कारण फ्रांस के मध्यम वर्ग के व्यक्तियों में लोकप्रिय होती हुई संशयवाद की प्रवृत्ति थी जिसके प्रभाव से ईश्वर का अस्तित्व तथा चर्च की उपयोगिता दानी ही विवाद के विषय बन गये थे। दूसरा कारण, चर्च के सामन्तीय अधिकार तथा उनका कठोरता से लागू किया जाना था जिसके कारण किसानों में चर्च के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न होने लगा।

पादरियों में भी दो श्रेणियाँ थीं-


() उच्च पादरी (1) सामान्य पादरी। उच्च पादरी वग में आर्कबिशप, ऐबे आदि पद थे। ये प्रायः कुलीनों के पुत्र होते थे। इनकी आमदनी बहुत थी और ये शान-शौकत एवं आराम का जीवन बिताते थे।“ धार्मिक कार्यों में उनकी रुचि बहुत कम थी और उनमें से अधिकांश अपने धार्मिक कार्यक्षेत्र को छोड़कर राज दरबार में रहकर भोग विलास का जीवन व्यतीत करते थे। वे ईश्वर के अस्तित्व तक में विश्वास नहीं रखते थे। एक बार लुई सोलहवें ने पेरिस के आर्कबिशप की नियुक्ति करते समय कहा था- “कम से कम पेरिस में तो हमको एक ऐसा आर्कबिशप रखना है, जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखता हो ।" इस श्रेणी के लोग सामान्य पादरियों को हेय समझते थे। यह उच्च पुरोहित वर्ग धर्म के आदर्शों को भूलकर प्रष्ट एवं विलासमय जीवन । बिता रहा था, जिससे जनता में उनके प्रति श्रद्धा के स्थान पर असंतोष एवं विरोध की भावना बढ़ रही थी।

अमेरिकी बस्तियों व फ्रांस में समझौता

अमेरिकी बस्तियों व फ्रांस में समझौता


इस पर युद्ध की दिशा ही बदल डाली।" साराटोगा में अग्रेजों की हार का एक महत्वपूण यह हुआ कि फ्रांस, स्पेन आदि यूरोपीय देशों को अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करने के प्रोत्साहित कर दिया। यह ज्ञातव्य है कि 1776 ई.से ही फ्रांस इस युद्ध म. था और सप्तवर्षीय युद्ध का इंग्लैण्ड से बदला लेने पर उतारू था। 6 फरव अमेरिकी बस्तियों व फ्रांस में समझौता हो गया कि

(1) कोई भी अलग से‌‍‌‌ल शांति-बात नहीं करेगा,


(ii) जब तक अमेरिकी बस्तियाँ पूर्ण रूप से स्व जाती. युद्ध जारी रखा जायेगा। इस समझौते को काने में मुख्य भूमिका में की रही। 178 में फ्रांस युद्ध में कूद पड़ा। 17798 में स्पेन खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी क्योंकि वह भी जिब्राल्टर वापस छीनना हलिण्ड ने 17801 में हलण्ड के खिलाफ युद्ध घोषित कर दिया क्योकि 211 अभिया एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया में अपने पाँच जमाने के लिए इंग्लैण्ड को अंध महासागर * फैसाए रखना चाहता था ।

रूस, डेनमार्क व स्वीडन ने भी हथियार बंद तटस्थता" की घोषणा कर दी और यह भी इंगलैण्ड के विरुद्ध ही थी। फ्रांस व स्पेन की नी-सेनाओं के युद्ध में उतरते ही युद्ध का नक्शा बदल गया । हालाँकि अंग्रेज एडमिरल रोडनी ने अमेरिकी समुद्रों में और सर जॉर्ज इलियट ने जिमाल्टर में इस दौरान अंग्रेजी माल की काफी रक्षा की। लेकिन अमेरिकी और फ्रांसीसी सेनायें अब अंग्रेजी सेना से इतनी श्रेष्ठ हो चुकी थीं कि अंततः अंग्रेजी सेनाध्यक्ष लार्ड कार्नवालिस (जो बाद में भारत का गवर्नर जनरल बना) को 19 अक्टूबर, 1781 में यार्कटाउन में हथियार डालकर आत्मसमर्पण करना पड़ा। किन्तु नौ-सैनिक युद्ध चलता रहा । फ्रांस और स्पेन इंग्लैण्ड के विरुद्ध लड़ते रहे। अन्त में 1783 ई. में पेरिस की संधि से अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम की समाप्ति हुई। पेरिस की संधि (3 सितम्बर, 1783) ) इंग्लैण्ड ने 13 अमेरिकी बस्तियों की स्वतन्त्रता को मान्यता प्रदान कर दी। इस नये राष्ट्र (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका) को अलगानी पहाड़ों और मिसिसिपी नदी के बीच के अंग्रेजी क्षेत्र भी सौंप दिए गए।


हथियार बंद तटस्थता


(ii) फ्रांस को इंग्लैण्ड से वेस्टइंडीज में सेंट लूसिया, टोबागो; अफ्रीका में सेनीगाल व गौरी, तथा भारत में कुछ क्षेत्र प्राप्त हुए।

(iii) स्पेन को फ्लोरिडा तथा भू-मध्य-सागर में माइनारका का टापू मिला।

(iv) इंग्लैण्ड व हॉलैण्ड में युद्ध पूर्व स्थिति वापस लाई गई।

(v) नये अमेरिकी राष्ट्र की सीमा ओहायो नदी के साथ-साथ तय की गई। अमेरिका का संविधान इस प्रकार अमेरिका स्वतन्त्र हुआ। पेरिस संधि के द्वारा युद्ध समाप्त होते ही अमेरिकी राज्यों में आपसी मतभेद उमरने लगे परन्तु कुछ समय बाद मतभेदों को सुलझा लिया गया। नया संविधान 1789 ई. में लागू हुआ। अमेरिका में गणतन्त्र की स्थापना की गई तथा संघ पद्धति स्वीकार की गई जिसके अन्तर्गत शक्तियों का विभाजन संघीय और राज्य सरकारों के बीच किया गया | नये संविधान में अमेरिका के नागरिकों को अनेक अधिकार दिए गए जिनमें प्रमय अधिकार थे-भाषण, प्रकाशन (प्रेस) और धर्म की स्वतन्त्रता, कानून अनुसार न्याय प्राप्त करने का अधिकार |

भाषण, प्रकाशन (प्रेस) और धर्म की स्वतन्त्रता


नये संविधान में किसी भी व्यक्ति का कानूनी प्रक्रिया के अतिरिक्त जीवन, सम्पति और स्वतन्त्रता से वंचित न रखे जाने की गारण्टी गया । संविधान के अनुसार मार्च, 1789 में नयी सरकार का गठन हुआ जिसका प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन को बनाया गया । अंग्रेजों की असफलता के कारण प्रजा की पराजय एक आश्चर्यजनक तथ्य था क्योंकि सप्तवर्षीय युद्ध के बाद अजय माना जाता था और उसकी तुलना में अमेरिकी पक्ष काफी कमजोर था। ही। इंग्लैण्ड विशाल साम्राज्य के जल सेना थी, आधुनिक अस्त्र-शस्त्र, प्रशिक्षित 212 उपनिदेशियों की स्थिति अंग्रेजों की तुलना में तुच्छ थी। इंग्लैण्ड स्वामी था, उसके पास एक अजेय जल सेना थी, आधनिक एव अनुभवी सेनानायक थे। लगभग सभी सामरिक स्थानों पर इसके विपरीत जॉर्ज वाशिंगटन की सेना बहुत छोटी थी। किसी वाशिंगटन युद्ध भूमि पर चार हजार हथियारबन्द सिपाहियों से अधिक था। अमरीकियों के पास हथियार तथा गोला बारूद की कमी मी भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनके पास पहनने को वस्त्र आदि भी नहीं थी क स्थानों पर अंग्रेज छावनियाँ हैं। दी थी।


प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन


किसी भी समय पर जाई सिपाहियों से अधिक नहीं जुट माया मट की कमी भी थी, और दिक , सैनिकों के पैरों में जूते तक नहीं थे। लेकिन इसके बावजूद इंग्लैण्ड को पराजय सामना करना पड़ा और अमेरिका को विजयश्री प्राप्त हुई। इंग्लैण्ड की युद्ध नीति तय करने वालों ने अमेरिकी शक्ति का ठीक अनुमान नहुँ लगाया । उन्हें अपनी शक्ति पर ज्यादा ही भरोसा था। जनरल गेज ने लन्दन गई एक रिपोर्ट में कहा भी था कि अमेरिकी उपनिदेशों को जीतने के लिए कदम शार रेजीमेंट पर्याप्त होगी। कुछ व्हिग नेताओं जैसे विलियम पिट, एडमण्ड बर्क चार्ल्स फॉक्स अदि की सहानुभूति अमरीकियों के साथ थी। इसके अलावा अंग्रेज सेना के कई सिपाही अमेरिकी पक्ष को सही मानते थे। अतः उन्होंने भी युद्ध में उस भावना से काम नहीं लिया जो के आमतौर पर सैनिक दुश्मन के प्रति रखते हैं। इंग्लैण्ड के व्यापारी भी अमेरिका युद्ध किये जाने के पक्ष में नहीं थे।

अमेरिका को विजयश्री प्राप्त


इंग्लैण्ड से अमेरिका तीन हजार मील की दरी पर स्थित है। यातायात का के अभाद ने इस दूरी को और अधिक बढाया जिससे सैनिक सहायता पहुंचान था। स्थिति और अधिक कठिन उस समय हो गई जब फ्रांत इस्त आन अतलांतिक महासागर पर अंग्रेजी रसद पूर्ति रेखा को भंग कर दिया था स्थानाय सहयोग के अनाव में काफी बडी कठिनाई में पड़ गई । इतना नफले हुए थे। उपनिवेशवाली के दौरान उन्हें किसी Dr.cimmallur पर भी अंग्रेजी सेना स्थानीय सहयोग के अभाव में काफाब अलावा, युद्ध के केन्द्र भी लगभग एक हजार मील के घेरे में फैले हुए। अपनी घरती की भौगोलिक स्थिति से पूर्ण परिचित थे, इसाल विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा जबकि अंग्रेज विदर जॉर्ज की अलोकप्रियता एवं अधिकारियों को विजय सरल कर दी। देश का प्रभावशाली द शक्तिशाली शासक का स्वप्न धीरे-धीरे साकार हो रहा था परन्तु इसे साकार अनुनदी नेता सरकार से अलग होते जा रहे थे।

जाज गम्भीरता और दूसरों की योग्यता परखने की शक्ति नहीं था जयाक अंग्रेज विदेश में लड़ रहे थे। भारयों को अयोग्यता ने उपनिदेशवासियों के हा लोग ला शासक बनने का जो स साकार करने के प्रयास में लगभग जिॉर्ज तृतीय में स्थिति की द द्वितीय की भौति नाम मात्र का शासक नहा र निरंकुशता से शासन करना चाहता था। सत करना चाहता था। जॉर्ज का प्रधानमन्त्री लाई ना लार्ड नॉर्थ इस युद्ध में मन्त्रिमण्डल को साथ नहा शक्ति नहीं थी। वह अपने पूर्वज जॉज का शासक नहीं रहना चाहता था। वह था। वह उपनिवेशों पर का खर्च वह अमेरिका से स्कूल साथ एक अयोग्य व्यक्ति साबित का साथ नहीं रख पाया। अमेरिकी मामला का मामलों के मन्त्री

क्रांति पूर्व अमेरिका की स्थिति

क्रांति पूर्व अमेरिका की स्थिति


उत्तर में मेन से दक्षिण में जार्जिया तक कुल तेरह अंग्रेजी पत्तियों थीं। इन उपनिवेशों 1713 से 1763 ई. के बीच जनसंख्या में चार गुना वृद्धि हुई। इसकी तुलना में क्षेत्रफल । पनि गुना बढ़ोतरी हुई जो कि बस्तीवासियों के पश्चिम की ओर अग्रसर होने से हुई।

1763 ई. के बीच बड़ी संख्या में अंग्रेज, स्कॉट, जर्मन तथा फ्रेंच आप्रवासी का बस्तियों में जाकर बसे । ये वाणिज्यवाद के महत्वपूर्ण वर्ष थे। अमेरिका के उत्पादनों यथा लकड़ी, चमड़ा, तम्बाकू, चीनी, तांबा, मछली आदि की कीमतें इंग्लैण्ड यद्यपि इंग्लैण्ड की व्यापारिक ती के कारण हैऔर इंग्लैण्ड की यात्रा पर जाना 196 तथा यूरोप में तेजी से बढ़ी जिससे अमेरिकी लोग समृद्ध हुए, यद्यपि डरले नीति लगातार बाधाएँ खड़ी करती रही 1 50 वर्षों की लगातार र अमेरिकी तत्कालीन विश्व में ऊँचा जीवनस्तर बना पाये । इंग्लैण्ट की अब एक आम बात बन गई थी । विदेशों से पुस्तकों का आयात बहत सपस्तकों का आयात बहुत बड़े स्तर पर किया जाने लगा था और कई पत्र-पत्रिकायें अमेरिका में भी छपने लगी थीं। अमेरीकियों का लगाव पैदा हो चुका था । कुछ पत्रों जैसे गजट, न्यूयॉर्क रिसा की यूरोप तक में माँग हो चुकी थी । बोस्टन व अनापोलीस जैसे नगरों में डंग्ज तुलना में अधिक सुन्दर भवनों का निर्माण किया गया। कई प्रसिद्ध अमेरिकी विश्वविद्या जैसे प्रिंस्टन, येल, डार्ट माउथ, बाउन इत्यादि क्रांति से पूर्व स्थापित हो चुके थे। क्रांति काल के कुछ महत्त्वपूर्ण अमेरिकी नगर थे-बोस्टन, न्यूयार्क, जेम्स टाउन, चार्ल्स टाउन सवानाह, फिलाडेलफिया आदि ।

अमेरिकी क्रांति के कारण


यह आशा कभी भी नहीं की जा सकती थी कि अमेरिकी उपनिवेशवासी सदैव के लिए इंग्लैण्ड के अधीन रहते । परन्तु 1776 में तथा इससे पूर्व ऐसी घटनायें घटित हुई जिन्होंने क्रांति को जन्म दिया । अमेरिका की क्रांति निःसन्देह उपनिवेशों और मातृ राज्य में मौलिक मतभेदों के कारण हुई । वास्तव में अमेरिका का स्वतन्त्रता संग्राम मुख्यतः प्र ब्रिटेन तथा उसके उपनिवेशों के बीच आर्थिक हितों का संघर्ष था, किन्तु कई तराका । यह उस सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्ध भी विद्रोह था जिसकी उपयोग अमेरिका में कमी की समाप्त हो गई थी। दूसरे शब्दों में, अमेरिकी क्रांति एका आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, एवं धार्मिक अनेक शक्तियों का परिणाम थी। स युद्धों के पूर्व तक अमेरिकी उपनिवेशों को इंग्लैण्ड की तथा इंग्लैण्ड को अपने उपनिवेशों की चिन्ता नहीं थी, परन्तु 1763 ई. के पश्चात् इंग्लैण्ड द्वारा कठोर व्यापारवादी व्यवस्था एवं औपनिवेशिक नीति ने विद्रोह को जन्म दिया। न तो गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और न यहाँ कला व्यवस्था से पीडित थे वरन अमेरिकी उपनिवेशों ने अपनी स्वच्छन्दता व्यवहार तथा अपनी स्वायत्तता को बनाये रखने के लिए विद्रोह किया। ये तो अमेरिकामा पा का परिणाम थी । सप्तवर्षीय था इग्लैण्ड को अपने अमेरिकी पश्चात् इंग्लैण्ड द्वारा अपनाई गई हि को जन्म दिया। यह संघर्ष रन यहाँ के लोग सामन्ती वच्छन्दता, व्यवहार में स्वतन्त्रता यूतो


अमेरिका का स्वतन्त्रता  संग्राम


अमेरिका का स्वतन्त्रता  संग्राम 4 जुलाई, 1776 को आरम्म हुआ, किन्तु जैसा कि संयुक्त राज्य अ राष्ट्रपति जॉन एडम्स का कहना है, "क्रांति का आरम्भ युद्ध के पूर्व हा हा तो लोगों के मस्तिष्क एवं हृदय में वर्तमान थी।" अर्थात् क्रांति की पृष्ठ ही तैयार हो चुकी थी। यह स्मरणीय है कि उपनिदेशवासियों में पयाप्त उनमें से बहुत को, इंग्लैण्ड से कोई विशेष शिकायत भी न थी फिर भा उन्हें एकरा के सूत्र में कैसे आबद्ध कर दिया? वे शक्तिशाली इग्लन एकजुट हो गये और अन्त में उन्हें इस्लैण्ड के निरकेश शासन से किस प्रकार इन प्रश्नों के उत्तर हमें खोजने होंगे
कि संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वितीय म युद्ध के पूर्व ही हो चुका था। क्रांति पतमान थी।" अर्थात क्रांति की पष्ठभमि काफी पर म पर्याप्त भिन्नता थी और । फिर भी परिस्थितियों ने कशाली इंग्लैण्ड के विरुद्ध कैस किस प्रकार मुक्ति मिली?

(1) इंग्लैण्ड सरकार का नगण्य हस्तक्षेप


अमेरिकी स्वतन्त्रता का सबसे प्रमुख कारण यह था कि इंग्लैण्ड ने प्रारम्भ से ही इन उपनिवेशों के स्वशासन पर अंकुश लगाने या हस्तक्षेप करने का प्रयत्न नहीं किया । अपने निर्माण काल से ही उपनिवेश परिस्थितियों के अनुसार अपना विकास करने में स्वतंत्र थे। इंग्लैण्ड की सरकार ने जार्जिया के अतिरिक्त और किसी उपनिवेश को स्थापित करने में कोई प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया लेकिन सरकार द्वारा विभिन्न करों के लगाये जाने के पश्चात् जब उपनिवेश की स्वच्छन्दता में बाधा उपस्थित हुई, तब असंतोष पनपा और यही असंतोष क्रान्ति में बदल गया । प्रारम्भ में इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा कोई हस्तक्षेप न किए जाने के कई कारण थे:

(i) सत्रहवीं सदी में (1688 ई. तक) लगभग 85 वर्षों तक राजतन्त्र और संसद में संघर्ष होता रहा । दोनों संस्थाओं के समर्थकों के बीच गृह-युद्ध की स्थिति बनी रही। अतः इतने लम्बे समय तक इंग्लैण्ड के राजनीतिज्ञों को इन उपनिवेशों के विषय में विचार करने के लिए समय नहीं मिला और अठारहवीं सदी के प्रारम्भ में ये उपनिवेश इतने विकसित हो गये थे कि उन पर कोई अंकुश लगाना सम्भव न था।


इंग्लैण्ड की आर्थिक व्यवस्था


(ii) अठारहवीं सदी के मध्य तक इंग्लैण्ड की आर्थिक व्यवस्था का आधार व्यापार ही था । व्यापारिक कम्पनियों को व्यापार के व्यापक अधिकार और सुविधायें प्रदान की गई थीं। इस समय उपनिवेशों का महत्व केवल इतना था कि उनसे कच्चा माल जैसे तम्बाकू, चीनी, लकड़ी, चावल, मछली आदि प्राप्त होता था । अतः उपनिवेशों के जीवन या उनके प्रशासन में इंग्लैण्ड की कोई रुचि नहीं थी।

(iii) इस समय त्रिकोणात्मक व्यापार था । डच तथा पुर्तगाली व्यापारी अफ्रीका से दास पकड़कर इन उपनिवेशों में बेचते थे और वहाँ से महुआ तथा शराब प्राप्त करते थे। उपनिवेशों में इन दासा के श्रम से उत्पन्न कच्चा माल इंग्लैण्ड जाता था जहाँ से चाय, वस्त्र और अन्य सामान अमेरिकी उपनिवेशों को भेजा जाता था । इंग्लैण्ड में ऐसे कानून अवश्य बनाये हुये थे जिनसे अंग्रेजी जहाजों में ही सामान लाया और ले जाया जाए, ये

कानून, 'नेवीगेशन ऐक्ट' कहलाते थे। किन्तु इन कानूनों का कभी सख्ती से पालन नहीं किया गया । प्रशान्त महासागर के विस्तार को देखते हुए यह सम्भव भी नहीं था और अमारकी भी इस दृष्टि से अपने को अंग्रेजों के विशेष अधीन नहीं समझते थे।

(2) उपनिवेशों में इंग्लैण्ड के प्रति प्रेम का अभाव


अमेरिका के उपनिवेशों में बसने वाले अधिकांश लोगों में इंग्लैण्ड के प्रति कोई विशेष प्रेम न था, इसके कारण थे

(1) कई लोग धार्मिक अत्याचारों से परेशान होकर उपनिवेशों में आ कर बसे थे। २० इग्लण्ड के चर्च और वहाँ की सरकार से कोई विशेष सहानुगति न थी।
(i) अंग्रेजों के अतिरिक्त अन्य यूरोपीय देशों के काफी लोग भी उपनिवेशों में आ कर बस गये थे। उन लोगों से इंग्लैण्ड के लिए किसी हमदर्दी की आशा नहीं की जा सकती थी।

रोमन कैथोलिक चर्च के प्रति विरोध-भाव नीर-क्षीर

रोमन कैथोलिक चर्च के प्रति विरोध-भाव नीर-क्षीर


अन्धविश्वास और अन्याय का पर्दाफाश करना उसने अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित किया। उसके सम्पर्ण साहित्य में रोमन कैथोलिक चर्च के प्रति विरोध-भाव नीर-क्षीर की भाँति व्याप्त है। इतिहासकार ग्रान्ट तथा टेम्परले का अभिमत है कि, “सभी दार्शनिकों में वह सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला व्यक्ति था । उसके विचार न तो गहराई में गये
और न ही यूरोपियन चिन्तन में उसने कोई मौलिक एवं महत्वपूर्ण योग दिया। फिर भी यूरोप में विचारों का प्रचार करने में उसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। उसके सबसे अधिक
तीक्ष्ण प्रहार चर्च के विचारों और कार्यों के विरुद्ध हए । राजनीति में वह न उदार था और न लोकतन्त्रवादी, पर वह यह चाहता था कि फ्रेडरिक महान के ईमानदार आर उपकार एवं स्वच्छन्द शासन का सर्वत्र अनुकरण किया जाए। उसने सबसे अधिक अपना और अपने कार्यों से अपने समय की धार्मिक असहिष्णता पर आक्रमण किया ।.

अठारहवीं शताब्दी और फ्रांस की क्रांति


वाक्-चातुर्य और उसका व्यग्य, उसकी भाषा की स्पष्टता तथा उसका मानवतावास अठारहवीं शताब्दी और फ्रांस की क्रांति में व्याप्त रहे ।" वाल्तयर ने इंग्लैण्ड प्रवास के अपने अनभवों को 1733 ई. में एक पुसमें प्रकाशित किया जो "लैटर्स ऑन इंग्लिश" के नाम से विख्यात हई। इस उसने बड़ी निर्भीकता के साथ अंग्रेजी संस्थाओं, धर्म एवम् विचार स्वातन्त्र्य फ्रांस की मौजूदा अवस्थाओं के साथ तुलना की । फ्रासीसा सर प्रतिबन्ध लगा दिया लेकिन इससे और भी अधिक लोगों में इस पुरु एक पुस्तक के रूप हुई। इस पुस्तक में चार स्वातन्त्र्य भावनाओं की
जीवन्ध लगा दियावस्थाओं के जीत कशासा जागृत हुडा लेकिन इससाथ तुलना की तासी सरकार ने इस पुस्तक पर 'लोगों में इस पुस्तक को पढ़ने की मानता था। उसके विचार से,
वाल्तेयर न्यूटन को सीजर और सिकन्दर से महान् मानता था। "हमारे सम्मान का पात्र वह है जो हमारे मस्तिष्क पर सच्चाई के वह नहीं जो हिंसा के माध्यम से प्रभुत्व स्थापित करता है। चाहिए जो संसार को समझता है; उसका नहीं जो उसको भ्रष्ट करत की वैयक्तिक स्वतंत्रता एवम् प्राकृतिक अधिकारों का प्रबल पोषक फ्रेडरिक महान् को अपना आदर्श मानता था।


कानून सरल भाषा में होना चाहिये


वाल्तेयर संवैधानि था तथापि विधियों के निर्माण में शासित्तों के हितों का ध्यान रखन उसकी मान्यता थी कि दण्ड अपराध के अनुपात  में दिया जाना चा पित करता है। हमें सम्मान उसका क
प्रभाव डालता है. अष्ट करता है। वाल्तेयर मनुष्य ल पोषक था। वाल्तेयर प्रशा के । वाल्तेयर संवैधानिक राजतन्त्र का त्रि का पोषक पान रखने का हिमायती था। जाना चाहिए। वह अपराधी  विरुद्ध पूर्ण साक्ष्य की उपस्थिति में ही अपराधी को दण्ड देने का पक्षपाती था। उसका यह भी कहना था कि कानून सरल भाषा में होना चाहिये जिससे जन-सामान्य सुगमता से समझ सके।
वाल्तेयर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "लुई 14 वें का युग में न केवल तुई के विषय में लिखा वरन् उस समय के विचारकों, लेखकों, कलाकारों आदि की भी चर्चा करके तत्कालीन प्रबुद्धता को जीवन्त करने का प्रयत्न किया। इस दृष्टि से उसको यह पुस्तक लेखन की दिशा में महत्वपूर्ण थी। इतिहास लेखन में दर्शन, कला एवं विचारों का समावेश इसी समय से होता है। _1763 ई. में प्रकाशित 'ट्रिटाइज ऑन टॉलरेन्स में उसने असहनशीलता को अनुचित ही नहीं वरन् एक कलंक बताया । अठारहवीं सदी में असहनशीलता जीवन के विनित्र क्षेत्रों में यथा समाज, राजनीति, धर्म, शिक्षा आदि क्षेत्रों में छायी हुई थी।

ईसाई धर्म में दुश्मनों को भी प्यार करने की बात


"ईश्वर ने क्या यह हाथ और हृदय दूसरों की हत्या करने और सोचने के लिये दिये हैं ? "जिस ईसाई धर्म में दुश्मनों को भी प्यार करने की बात कही गई है क्या वही ईसाई अपने भाइयों के हत्यारे नहीं हैं ?” ऐसे ही अनेक प्रश्न इस पुस्तक में उठाये गये । इस प्रकार उसने असहनशीलता के विरुद्ध वैचारिक वातावरण तैयार करने की कोशिश की।

वाल्तेयर ने 60 वर्षों तक यूरोप को मध्यकालीन विचारों के दलदल से निकालने के लिए कड़ा संघर्ष किया । 'उसने अन्याय, कट्टरता, विशेषाधिकार और धार्मिक दुराग्रह से प्रभावशाली ढंग से लड़ाई लड़ी। सच तो यह है कि 18वीं शताब्दी की जागृति आज वाल्तेयर युग के रूप में जानी जाती है। किसी भी आलोचक से अधिक वाल्तेयर ने उस सामाजिक उत्तेजना को भड़काया, जो अन्ततः फ्रांसीसी क्रांति में परिणत हो गई।


विवेक, प्रबुद्धता और प्रकृति के सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार का श्रेय


वाल्तेयर को फ्रांस में ही नहीं सारे यूरोप में विवेक, प्रबुद्धता और प्रकृति के सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार का श्रेय प्राप्त है। लोगों को बुद्धिवाद और नये विचारों की तरफ झुकाने में वाल्तेयर की रचनाओं का बड़ा भारी असर पड़ा। उसने विचार स्वातन्त्रय के लिए पृष्ठभूमि बनाई तथा परिवर्तन की बात बड़े प्रभावशाली एवं साहसपूर्ण ढंग से कही। यही उसका सबसे बड़ा योगदान था। इतिहासकार हालेण्ड रोज लिखते हैं कि “यद्यपि वाल्तेयर ने पुरानी शासन-व्यवस्था के राजनीतिक रूपों पर प्रहार नहीं किया परन्तु सत्ता, परम्परा, रूढ़िवादी विचारों पर, जिस पर वे टिके थे, आक्रमण करके उसने नीव को खोखला करना प्रारम्भ कर दिया था ।" इतिहासकार हेजन के शब्दों में, “वाल्तेयर यूरोपीय इतिहास का एक महान मनीषी हुआ है और उसके नाम पर एक युग का नाम पड़ गया है ....... उसके समय में उसका क्या महत्व था, इसका पता इस बात से चलता है कि लोगों ने उसे राजा वाल्तेयर', की संज्ञा दे रखी थी ... किंतु जो लोग मानव स्वतन्त्रता के संग्राम में युद्ध करना चाहते उनके लिए दिन में वह दिशा-सूचक बादल का और रात्रि में प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करता था।

वाल्तेयर यूरोपीय इतिहास का एक महान मनीषी हुआ


रूसो-जीन जेकस रूसो फ्रांस का सर्वाधिक प्रबुद्ध दार्शनिक था। रूसो ने अपने जीवन में अनेक निबन्ध, उपन्यास और अन्त में अपनी जीवनी लिखी। रूसो का जन्म के नौ दिन पश्चात् ही माँ के घर व्यतीत हुआ जहाँ उसे 180 1212 जिनेवा के पदनाम घड़ीसाज के घर हुआ | जन्म के नौ को सत्य हो जाने से रूसो का प्रारम्भिक जीवन एक पादरी के घर व्यती भाइबिल सनने का अवसर प्राप्त हुआ। शिक्षा के अभाव एवं गरीबी में रूसो एवं गरीबी में रूसो को जीवन में लय में शिक्षा ग्रहण नहीं - गों का सामना करना पड़ा । बचपन से ही उस प्रमण था और वह जीवन भर इधर-उधर घूमता रहा, यद्यपि इस सिलसिले में उसे कष्ट भी सहन करने पड़े । उसने नियमित रूप से किसी विद्यालय में शिक्षा की थी किन्तु उसने एक रचनात्मक मस्तिष्क पाया था। जीवन में अपने निजी से ही उसने अपने को शिक्षित किया । गरीबी का उसने निकट से अहसास किया गरीबी के कारण वह एक पिता के कर्तव्यों का भी पालन न कर पाया और अपने दी को अनाथालय में छोड़ दिया था।

Every man is asking a woman this thing ... but never mistakenly asking a woman this thing, otherwise she will have to repent.

Every spouse is a woman and a man.  Even though God made them both, they are still different in many respects.  Every man sees a woman who ...