Monday, September 2, 2019

रोमन कैथोलिक चर्च के प्रति विरोध-भाव नीर-क्षीर

रोमन कैथोलिक चर्च के प्रति विरोध-भाव नीर-क्षीर


अन्धविश्वास और अन्याय का पर्दाफाश करना उसने अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित किया। उसके सम्पर्ण साहित्य में रोमन कैथोलिक चर्च के प्रति विरोध-भाव नीर-क्षीर की भाँति व्याप्त है। इतिहासकार ग्रान्ट तथा टेम्परले का अभिमत है कि, “सभी दार्शनिकों में वह सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला व्यक्ति था । उसके विचार न तो गहराई में गये
और न ही यूरोपियन चिन्तन में उसने कोई मौलिक एवं महत्वपूर्ण योग दिया। फिर भी यूरोप में विचारों का प्रचार करने में उसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। उसके सबसे अधिक
तीक्ष्ण प्रहार चर्च के विचारों और कार्यों के विरुद्ध हए । राजनीति में वह न उदार था और न लोकतन्त्रवादी, पर वह यह चाहता था कि फ्रेडरिक महान के ईमानदार आर उपकार एवं स्वच्छन्द शासन का सर्वत्र अनुकरण किया जाए। उसने सबसे अधिक अपना और अपने कार्यों से अपने समय की धार्मिक असहिष्णता पर आक्रमण किया ।.

अठारहवीं शताब्दी और फ्रांस की क्रांति


वाक्-चातुर्य और उसका व्यग्य, उसकी भाषा की स्पष्टता तथा उसका मानवतावास अठारहवीं शताब्दी और फ्रांस की क्रांति में व्याप्त रहे ।" वाल्तयर ने इंग्लैण्ड प्रवास के अपने अनभवों को 1733 ई. में एक पुसमें प्रकाशित किया जो "लैटर्स ऑन इंग्लिश" के नाम से विख्यात हई। इस उसने बड़ी निर्भीकता के साथ अंग्रेजी संस्थाओं, धर्म एवम् विचार स्वातन्त्र्य फ्रांस की मौजूदा अवस्थाओं के साथ तुलना की । फ्रासीसा सर प्रतिबन्ध लगा दिया लेकिन इससे और भी अधिक लोगों में इस पुरु एक पुस्तक के रूप हुई। इस पुस्तक में चार स्वातन्त्र्य भावनाओं की
जीवन्ध लगा दियावस्थाओं के जीत कशासा जागृत हुडा लेकिन इससाथ तुलना की तासी सरकार ने इस पुस्तक पर 'लोगों में इस पुस्तक को पढ़ने की मानता था। उसके विचार से,
वाल्तेयर न्यूटन को सीजर और सिकन्दर से महान् मानता था। "हमारे सम्मान का पात्र वह है जो हमारे मस्तिष्क पर सच्चाई के वह नहीं जो हिंसा के माध्यम से प्रभुत्व स्थापित करता है। चाहिए जो संसार को समझता है; उसका नहीं जो उसको भ्रष्ट करत की वैयक्तिक स्वतंत्रता एवम् प्राकृतिक अधिकारों का प्रबल पोषक फ्रेडरिक महान् को अपना आदर्श मानता था।


कानून सरल भाषा में होना चाहिये


वाल्तेयर संवैधानि था तथापि विधियों के निर्माण में शासित्तों के हितों का ध्यान रखन उसकी मान्यता थी कि दण्ड अपराध के अनुपात  में दिया जाना चा पित करता है। हमें सम्मान उसका क
प्रभाव डालता है. अष्ट करता है। वाल्तेयर मनुष्य ल पोषक था। वाल्तेयर प्रशा के । वाल्तेयर संवैधानिक राजतन्त्र का त्रि का पोषक पान रखने का हिमायती था। जाना चाहिए। वह अपराधी  विरुद्ध पूर्ण साक्ष्य की उपस्थिति में ही अपराधी को दण्ड देने का पक्षपाती था। उसका यह भी कहना था कि कानून सरल भाषा में होना चाहिये जिससे जन-सामान्य सुगमता से समझ सके।
वाल्तेयर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "लुई 14 वें का युग में न केवल तुई के विषय में लिखा वरन् उस समय के विचारकों, लेखकों, कलाकारों आदि की भी चर्चा करके तत्कालीन प्रबुद्धता को जीवन्त करने का प्रयत्न किया। इस दृष्टि से उसको यह पुस्तक लेखन की दिशा में महत्वपूर्ण थी। इतिहास लेखन में दर्शन, कला एवं विचारों का समावेश इसी समय से होता है। _1763 ई. में प्रकाशित 'ट्रिटाइज ऑन टॉलरेन्स में उसने असहनशीलता को अनुचित ही नहीं वरन् एक कलंक बताया । अठारहवीं सदी में असहनशीलता जीवन के विनित्र क्षेत्रों में यथा समाज, राजनीति, धर्म, शिक्षा आदि क्षेत्रों में छायी हुई थी।

ईसाई धर्म में दुश्मनों को भी प्यार करने की बात


"ईश्वर ने क्या यह हाथ और हृदय दूसरों की हत्या करने और सोचने के लिये दिये हैं ? "जिस ईसाई धर्म में दुश्मनों को भी प्यार करने की बात कही गई है क्या वही ईसाई अपने भाइयों के हत्यारे नहीं हैं ?” ऐसे ही अनेक प्रश्न इस पुस्तक में उठाये गये । इस प्रकार उसने असहनशीलता के विरुद्ध वैचारिक वातावरण तैयार करने की कोशिश की।

वाल्तेयर ने 60 वर्षों तक यूरोप को मध्यकालीन विचारों के दलदल से निकालने के लिए कड़ा संघर्ष किया । 'उसने अन्याय, कट्टरता, विशेषाधिकार और धार्मिक दुराग्रह से प्रभावशाली ढंग से लड़ाई लड़ी। सच तो यह है कि 18वीं शताब्दी की जागृति आज वाल्तेयर युग के रूप में जानी जाती है। किसी भी आलोचक से अधिक वाल्तेयर ने उस सामाजिक उत्तेजना को भड़काया, जो अन्ततः फ्रांसीसी क्रांति में परिणत हो गई।


विवेक, प्रबुद्धता और प्रकृति के सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार का श्रेय


वाल्तेयर को फ्रांस में ही नहीं सारे यूरोप में विवेक, प्रबुद्धता और प्रकृति के सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार का श्रेय प्राप्त है। लोगों को बुद्धिवाद और नये विचारों की तरफ झुकाने में वाल्तेयर की रचनाओं का बड़ा भारी असर पड़ा। उसने विचार स्वातन्त्रय के लिए पृष्ठभूमि बनाई तथा परिवर्तन की बात बड़े प्रभावशाली एवं साहसपूर्ण ढंग से कही। यही उसका सबसे बड़ा योगदान था। इतिहासकार हालेण्ड रोज लिखते हैं कि “यद्यपि वाल्तेयर ने पुरानी शासन-व्यवस्था के राजनीतिक रूपों पर प्रहार नहीं किया परन्तु सत्ता, परम्परा, रूढ़िवादी विचारों पर, जिस पर वे टिके थे, आक्रमण करके उसने नीव को खोखला करना प्रारम्भ कर दिया था ।" इतिहासकार हेजन के शब्दों में, “वाल्तेयर यूरोपीय इतिहास का एक महान मनीषी हुआ है और उसके नाम पर एक युग का नाम पड़ गया है ....... उसके समय में उसका क्या महत्व था, इसका पता इस बात से चलता है कि लोगों ने उसे राजा वाल्तेयर', की संज्ञा दे रखी थी ... किंतु जो लोग मानव स्वतन्त्रता के संग्राम में युद्ध करना चाहते उनके लिए दिन में वह दिशा-सूचक बादल का और रात्रि में प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करता था।

वाल्तेयर यूरोपीय इतिहास का एक महान मनीषी हुआ


रूसो-जीन जेकस रूसो फ्रांस का सर्वाधिक प्रबुद्ध दार्शनिक था। रूसो ने अपने जीवन में अनेक निबन्ध, उपन्यास और अन्त में अपनी जीवनी लिखी। रूसो का जन्म के नौ दिन पश्चात् ही माँ के घर व्यतीत हुआ जहाँ उसे 180 1212 जिनेवा के पदनाम घड़ीसाज के घर हुआ | जन्म के नौ को सत्य हो जाने से रूसो का प्रारम्भिक जीवन एक पादरी के घर व्यती भाइबिल सनने का अवसर प्राप्त हुआ। शिक्षा के अभाव एवं गरीबी में रूसो एवं गरीबी में रूसो को जीवन में लय में शिक्षा ग्रहण नहीं - गों का सामना करना पड़ा । बचपन से ही उस प्रमण था और वह जीवन भर इधर-उधर घूमता रहा, यद्यपि इस सिलसिले में उसे कष्ट भी सहन करने पड़े । उसने नियमित रूप से किसी विद्यालय में शिक्षा की थी किन्तु उसने एक रचनात्मक मस्तिष्क पाया था। जीवन में अपने निजी से ही उसने अपने को शिक्षित किया । गरीबी का उसने निकट से अहसास किया गरीबी के कारण वह एक पिता के कर्तव्यों का भी पालन न कर पाया और अपने दी को अनाथालय में छोड़ दिया था।

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