Thursday, September 19, 2019

फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था

फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था


प्रत्येक वर्ग के भीतर विभिन्न श्रेणियों के बीच अधिकारों एवं सुविधाओं की दृष्टि से भारी विषमताएँ थीं । "फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था का आधार कोई विधान या कानून नहीं वरन् विशेषाधिकार, रियायतें और छूट थी। इस प्रकार की व्यवस्था के फलस्वरूप जनजीवन में संशय, अविश्वास एवं असंतोष ही पनप सकता था । यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि फ्रांस की कुल जनसंख्या के अनुपात में विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग के लोगों की संख्या एक प्रतिशत से अधिक नहीं थी। क्रान्ति से पूर्व फ्रांस की कुल जनसंख्या ढाई करोड़ थी, जिनमें से लगभग डेढ़ लाख पादरी और लगभग एक लाख चालीस हजार सामन्त थे।

विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग


इतनी कम जनसंख्या होते हुए भी उच्च वर्ग के लोग अधिकारी, सुविधाओं एवं जीवन स्तर की दृष्टि से शेष 99 प्रतिशत देशवासियों से बहुत आगे थे। अनुमान लगाया गया है कि जागीरदारों एवं चर्च के धर्माधिकारियों में प्रत्येक के पास फ्रांस की समस्त सम्पत्ति का पाचवाँ भाग था। फिर भी ये दोनों वर्ग कर से मुक्त थे और साधनहीन तृतीय वर्ग के लोगों को करों से लाद दिया गया था। इन दोनों वर्गों को प्रदत्त विशेषाधिकारों ने जनसामान्य को विरोधी बना दिया । अगर राजा विशेषाधिकार का प्रश्न हल कर देता और मध्यमवर्ग को उचित स्थान दिला देता, तो शायद क्रान्ति नहीं होती । नेपोलियन ने ठीक ही कहा था कि मध्यमवर्ग का अहंभाव ही क्रान्ति का असली कारण था; स्वतन्त्रता तो एक बहाना मात्र थी। इतिहासकार मेरियट का मत है कि “वास्तव में जब क्रान्ति हुई तो वह मुख्यतः राजा के निरंकुश एकतन्त्र के विरुद्ध नहीं, वरन् विशेषाधिकारों से युक्त वाँ-कुलीन व पुरोहित के विरूद्ध थी और क्रान्तिकारियों ने आरम्भ में उन्हीं को ही समाप्त किया "


(क) पादरी


फ्रांस की अधिकांश जनता रोमन कैथोलिक मतावलम्बी थी। अतः कै थोलिक चर्च का काफी प्रभाव था। उसका अपना देशव्यापी संगठन था। उसके पास अतुल सम्पत्ति थी और परम्परा के अनुसार वह राज्य के करों से मुक्त था। इसके साथ ही शिक्षा, जन्ममृत्यु के आंकड़े, विवाह एवं अन्य सामाजिक और धार्मिक संस्कारों आदि पर पादरियों का एकाधिकार-सा था। उसे पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं के अभिवेचन (सैंसर) करने का अधिकार था। चर्च के पृथक् न्यायालय और कानून थे। उसके व्यापक अधिकारों एवं प्रभाव के कारण ही यह कहा गया है कि फ्रांस का चर्च “राज्य के अन्दर राज्य” था।

फ्रांस की सम्पूर्ण जागीरी भूमि की बीस प्रतिशत भूमि चर्च के अधीन थी, जिससे चर्च की बहुत अधिक आय होती थी। इसके अलावा चर्च किसानों से सब प्रकार की फसलों पर धर्माश" (एक प्रकार का धार्मिक कर) भी वसूल करता था । अनुमानतः चर्च की वार्षिक आय राजकीय आय से आधी थी । यद्यपि चर्च इस आय का कुछ भाग धार्मिक कार्यों, जनहित तथा शिक्षा के प्रसार में खर्च करता था किन्तु चर्च के भीतर घोर पक्षपात एवं अपव्ययता का बोलबाला था । अठारहवीं शताब्दी में चर्च बहुत अधिक बदनाम एवं अलोकप्रिय हो गया था। लोगों की नजर में खटकने वाली बात यह थी कि चर्च की बढ़ती हुई सम्पदा के साथ पादरी अपने धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा करते जा रहे थे । चर्च की अलोकप्रियता का एक मुख्य कारण फ्रांस के मध्यम वर्ग के व्यक्तियों में लोकप्रिय होती हुई संशयवाद की प्रवृत्ति थी जिसके प्रभाव से ईश्वर का अस्तित्व तथा चर्च की उपयोगिता दानी ही विवाद के विषय बन गये थे। दूसरा कारण, चर्च के सामन्तीय अधिकार तथा उनका कठोरता से लागू किया जाना था जिसके कारण किसानों में चर्च के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न होने लगा।

पादरियों में भी दो श्रेणियाँ थीं-


() उच्च पादरी (1) सामान्य पादरी।

उच्च पादरी वग में आर्कबिशप, ऐबे आदि पद थे। ये प्रायः कुलीनों के पुत्र होते थे। इनकी आमदनी बहुत थी और ये शान-शौकत एवं आराम का जीवन बिताते थे।“ धार्मिक कार्यों में उनकी रुचि बहुत कम थी और उनमें से अधिकांश अपने धार्मिक कार्यक्षेत्र को छोड़कर राज दरबार में रहकर भोग विलास का जीवन व्यतीत करते थे। वे ईश्वर के अस्तित्व तक में विश्वास नहीं रखते थे। एक बार लुई सोलहवें ने पेरिस के आर्कबिशप की नियुक्ति करते समय कहा था- “कम से कम पेरिस में तो हमको एक ऐसा आर्कबिशप रखना है, जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखता हो ।" इस श्रेणी के लोग सामान्य पादरियों को हेय समझते थे। यह उच्च पुरोहित वर्ग धर्म के आदर्शों को भूलकर प्रष्ट एवं विलासमय जीवन । बिता रहा था, जिससे जनता में उनके प्रति श्रद्धा के स्थान पर असंतोष एवं विरोध की भावना बढ़ रही थी।

सामान्य पादरी वर्ग में हजारों स्थानीय गिरजाघरों के छोटे पादरी थे, जो प्रायः निम्न वर्ग या कृषक वर्ग से आते थे। वे जनसाधारण के सभी धार्मिक कार्य करते और उनके सुख-दुःख में सम्मिलित होते थे। किन्तु इनकी आय इतनी कम होती थी कि उससे कई बार इनके लिए जीवन निर्वाह करना कठिन हो जाता था। ये फटे-पुराने कपड़े पहनते थे। इनके मन में चर्च के उच्चाधिकारियों, जो उनकी अवहेलना करते थे और ठाठ-बाट से रहते थे, के प्रति घृणा एवं आक्रोश का होना स्वाभाविक था। यथार्थ में इस श्रेणी के पादरी जनसाधारण के अधिक निकट थे और प्रचलित अन्यायपूर्ण व्यवस्था के दोषों से परिचित थे। इसी कारण उन्होंने क्रान्ति के समय जनता का समर्थन किया और उसे सफल बनाने में काफी सहयोग दिया।"


(ख) कुलीन वर्ग


यद्यपि कार्डिनल रिशलू और बाद में लुई चौदहवें (1643-1715 ई.) ने सामन्तों की शक्ति का अन्त करके उन्हें बहुत से अधिकारों से वंचित कर दिया था, फिर भी इस वर्ग को अभी भी बहुत सुविधायें तथा अधिकार प्राप्त थे। राज्य, चर्च तथा सेना के सभी उच्च पद इसी वर्ग के हाथों में थे और फ्रांस की समस्त भूमि का पाँचवाँ भाग उनके अधिकार में था।

अठारहवीं शताब्दी के कुलीन वर्ग की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि उसमें एकात्मकता एवं समरूपता का अभाव था। वंश की प्राचीनता, सामाजिक कार्यों का स्वरूप, राज दरबार के साथ सम्बन्ध आदि के आधार पर कुलीन वर्ग अनेक उपवर्गों में विभाजित था। अभिजात एवं प्राचीन वंशों के सामन्त राजकृपा प्राप्त नवोदित कुलीनों को, सैनिक पदों पर अधिकार रखने वाले कुलीन नागरिक प्रशासन के पदाधिकारी कुलीनों को तथा दरबारी कुलीन प्रान्तीय कुलीनों को हेय दृष्टि से देखते थे। इन विमित्रताओं के मध्य कुलीन वर्ग के सदस्य इस मायने में समान थे कि उन्हें समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त था। यह स्थान इस मान्यता पर आधारित था कि वे सामन्तीय भू-स्वामी हैं जो सरकार के कार्यों में हाथ बंटाते हैं, युद्ध में राजा की सेवा करते हैं तथा प्रामीण क्षेत्रों में कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने का उत्तरदायित्व उठाते हैं। अपनी इस विशिष्ट स्थिति के कारण कुलीन वर्ग के सदस्य करों से मुक्त थे तथा राज्य के विभिन्न पदों पर आसीन थे।

No comments:

Post a Comment

Every man is asking a woman this thing ... but never mistakenly asking a woman this thing, otherwise she will have to repent.

Every spouse is a woman and a man.  Even though God made them both, they are still different in many respects.  Every man sees a woman who ...