Wednesday, September 18, 2019

राजतन्त्र के पश्चाताप का युग

राजतन्त्र के पश्चाताप का युग


यह युग 'राजतन्त्र के पश्चाताप का युग' कहलाता है । अब निरंकुश, स्वेच्छाचारी, स्वार्थी, क्रूर एवं दमनशील राजत्व के स्थान पर उदार, लोकहितकारी, प्रबुद्ध व सर्वसाधारण के कल्याण हेतु राजत्व की स्थापना हुई । अब सार्वभौम राज्यों ने राजवंशीय हितवृद्धि के स्थान पर लोक-कल्याण के उद्देश्य को अपनाया | अब शासकों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के स्थान पर मानवता की विजय होने लगी। अब भी राजत्व निरंकुश था, परन्तु वह प्रबुद्ध निरंकुश राजत्व था। अब राजनीति पर प्रबोध लेखकों एवं विचारकों की छाप दिखाई देने लगी थी। अब जनसाधारण की शिक्षा की उन्नति, कृषक दासों का उत्थान, साहित्य का विकास, कठोर दण्ड-विधान में सुधार, निर्धनता का उन्मूलन, चिकित्सालयों का निर्माण, कानूनों का स्पष्टीकरण एवं सुधार तथा उनका संकलन इत्यादि महत्वपूर्ण परिवर्तन होने लगे।"

निर्धनता का उन्मूलन


रूस की साम्राज्ञी कैथराइन द ग्रेट (1762-1796 ई.) भी एक ऐसी ही शासिका थी, जिसने नये युग की प्रवृत्तियों से प्रभावित होकर अपने देश के शासन में अनेक महत्वपूर्ण सुधार किये । फ्रांस के प्रगतिशील विचारकों के साथ उसका घनिष्ट सम्बन्ध था । दिदरो का उसने रूस आमन्त्रित किया था और वाल्तेयर के साथ उसका पत्र-व्यवहार था। फ्रांस प्रकाशित विश्वकोश को वह ध्यानपूर्वक पढ़ती थी और सुधारों के लिए प्रेरणा उसने यविचारकों से ही प्राप्त की थी। चर्च की बहुत सी सम्पत्ति को उसने जन्त कर लिया और इस सम्पत्ति का उपयोग विद्यालयों की स्थापना और शिक्षा प्रसार के लिए किया। स्फ्यू के विचारों से प्रभावित होकर उसने एक राष्ट्रीय सभा का भी निर्माण किया था, 1 जनता के विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था। उसका मत था कि राज्य की शासक के लिए नहीं होती अपित शासक की सत्ता राज्य के लिए होती है।


चिकित्सालयों का निर्माण


वह  का विरोधी थी और यह मानती थी कि व्यक्तियों को उन सब कार्यों को करने त्रता होनी चाहिए, जो कानून द्वारा निषिद्ध न हों। इस सबके बावजूद उसकी मात का मुख्य आधार अपना निरंकुश शासन बनाए रखना था। सामन्तीकन रहा कुलीन वर्ग सम्बन्धी न्यायिक फैसले कुलीन वर्ग के ही व्यक्तियों जा सकते थे। कषि-दासों पर उत्पीड़न जारी रहे। कृषि-दासों को, जिनका
आन्तरिक नीति का मुख्य आ द्वारा किए जा सकते थे। ही मिला। 1773 ई. में हुए कि रणों को दूर करने की कि संख्या आबादी की आधी से अधिक थी, कुछ भी नहीं मिला। के विद्रोह को दबा दिया गया किन्तु विद्रोह के सामाजिक कारणों को चिंता नहीं थी। की गणना प्रबोध शासको अध्ययन किया था। उसे वाली चर्च के वर्चस्व का अन्त कर कोई भी आदेश तब तक आस्ट्रिा
आस्टिया के सम्राट जसिफ द्वितीय (1765-17903) की पर की जाती है। उसने दर्शन का गहन अध्ययन किया था।

कानूनों का स्पष्टीकरण एवं सुधार


तर्कपूर्ण सिद्धान्तों के आधार पर अपने साम्राज और रूसो से बड़ा लगाव था । वह तर्कपूर्ण सिद्धान्तों के आधार शासन व्यवस्था का पनर्निर्माण करना चाहता था। रोम के चर्च के की दृष्टि से उसने यह आज्ञा प्रसारित की कि पोप का कोई भी आदेश साम्राज्य में प्रचारित न किया जाए जब तक ऐसा करने के लिए सम्राट न कर ली जाए । पादरियों को राजकीय स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने के आदेश गए । यूरोप में पहली बार यहूदियों को भी कैथोलिकों के समान धार्मिक एवं राज अधिकार प्रदान किए गये। 1765 से लेकर 1769 ई. तक ऐसे अनेक उपाय अपनाए जिनके फलस्वरूप चर्च और अधिक भूमि प्राप्त नहीं कर सके | धर्म संघों में प्रदेश पर के इच्छुक व्यक्तियों की संख्या नियंत्रित कर दी गई, धर्म संघों को अपना आय-व्यय का लेखा-जोखा शासन के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए बाध्य किया गया। सरकार ने घर और धर्मसंघों की भूमि पर कर लगाया ।

जिन मठों ने शिक्षा, चिकित्सा, वृद्धों की देखभात करने जैसे क्षेत्रों में कोई उपयोगी सामाजिक कार्य नहीं किया और जिन्होंने अनार्जित आ के आधार पर केवल मठवासियों को ध्यान-प्रार्थना का जीवन बिताने की व्यवस्था की तथा जिन्होंने अत्यन्त वैभवपूर्ण मठ-भवन बनवाए, उन पर निषेधाज्ञा जारी कर दा गई मिलाकर 700 मठों का दमन किया गया और कल 65.000 में से 38,000 पेंशनभोगी बनाकर उन्हें मठ त्यागने के लिए विवश किया। जनहित के सुधार सम्राट ने अर्धदासों को स्वतन्त्र करने का आदेश दिया | उसने दीवाना और कानून संकलित करवाए । न्याय व्यवस्था कम खर्चीली और सरल बनाई गई नाम पर उत्पीड़न की परम्परा समाप्त कर दी गई और मृत्युदण्ड मा लगे । शिक्षा में अनेक महत्वपूर्ण पद प्रबोधन आन्दोलन के समथका पूर साम्राज्य को एक राष्ट्र बनाने की असफल कोशिश की।


कैथोलिकों के समान धार्मिक एवं राज अधिकार


यह दुःखद हत के सुधारों के क्षेत्र विानी और फौजदारी तरल बनाई गई। सजा ण्ड भी बहुत कम दिए जाने समर्थकों को दिए गए । उता दुःखद तथ्य रहा नगा तो उसे बहुत क्षोभ हुआ धारण के बीच सम्पर्क उसकी नीतियों को समर्थन नहीं मिला, उल्टे विरोध होने लग विशेषाधिकार प्राप्त दर्गा का विरोध, नौकरशाही और जन-साधारण अभाव और एक साथ अनेक संस्थाओं को सुधारने का प्रया समन्वय का अभाव आदि उसकी असफलता के कारण था ने अपने अधिकांश सुधारों को समाप्त करने की आज्ञा ददा प्रशा का राजा फ्रेडरिक द्वितीय (1740-1786ई.) की गणन जाती है। उसने अठारहवीं शताब्दी में हए परिवर्तनों का अध्यय उसका पत्र-व्यवहार था और शासक होने के बाद वाल्तेयर उस की तरह कुछ दिन रहा भी। उसमें धार्मिक सहिष्णुता. उदार । का प्रयत्न, आदर्श और यथाभ धर्म पहले निराश शाही प्रमा थी उस का अध्ययन किया था। वाला पाल्तयर उसके दरबार में अभिन ता, उदारता, विचारों की विशाल "7 शासकों में। था। वाल्लेया पार में अभिन्न किन लोक-कल्याण की इच्छा विद्यमान थी।

लोक-कल्याण की इच्छा


वह अत्यधिक परिश्रमी था | लुई की तरह भोग-विलास और प्रदर्शन में उसकी रुचि नहीं थी। अपव्यय को वह अपराध मानता था। वह जोसेफ की तरह आदर्शवादी भी न था । इंग्लैण्ड के संवैधानिक राजतन्त्र और फ्रांस के स्वेच्छाचारी राजतन्त्र के बीच उसने अपने राजत्व के सिद्धान्त का निर्धारण किया । उसने अपनी जागीर से भूमि-दास प्रथा का अन्त कर दिया था। वह चाहता था कि प्रशा के अन्य बड़े जागीरदार भी इस प्रथा का अन्त कर दें। पर इसमें उसे सफलता न मिली। आंतरिक क्षेत्र में उसने जमींदारों और किसानों को वैज्ञानिक ढंग से खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया। पहली बार आलू की खेती बड़े पैमाने पर शुरू हुई। धर्म के क्षेत्र में फ्रेडरिक महान् सहिष्णुता की नीति का पोषक था । उसका मन्तव्य था कि प्रत्येक व्यक्ति को धर्म के मामले में स्वतन्त्र होना चाहिए | उसकी प्रजा के बहुसंख्यक लोग प्रोटेस्टेन्ट चर्च के अनुयायी थे किन्तु उसने रोमन कैथोलिक लोगों को भी अपने विचारों के अनुसार चर्च स्थापित करने की अनुमति दे दी। उसके प्रजा-प्रेम का उदाहरण उसकी न्याय-विषयक तत्परता से प्रकट होता है।

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