Thursday, September 19, 2019

देनिस कोर्ट की शपथ

देनिस कोर्ट की शपथ


राजा की शासन आज्ञा के विरुद्ध एवं बिना स्वीकृति के राष्ट के प्रतिनिधियों को साधारण घोषणा ने प्राचीन सामन्तवादी एस्टेट्स जनरल को राष्ट्रीय सभा में रूपान्तरित किया एवं इसे फ्राँस में वैधानिक शासन स्थापित करने का उत्तरदायित्व सौपा । देनिस कोर्ट की शपथ दैविक अधिकारों पर आधारित निरंकुश राजतंत्र की समाप्ति, एवं जन इच्छा पर आधारित सीमित राजतंत्र के आरम्भ होने की घोषणा थी।

राष्ट्रीय सभा की घोषणा


इन कार्यवाहियों से चितित होकर राजा ने 23 जून को तीनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलायी, जिसमें राजा ने कतिपय सुधार लागू करने की इच्छा व्यक्त की किन्तु इसके साथ ही उसने तृतीय वर्ग के द्वारा राष्ट्रीय सभा की घोषणा को अमान्य करार दिया और रानी के दबाव में आकर तीनों वर्गों को पृथक्-पृथक् बैठने और मतदान करने की आज्ञा दी। राजा की आज्ञा से करों पर विचार करने के लिए तीनों वर्ग सम्मिलित रूप से बैठ सकते थे। किन्तु इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया था कि कुलीन लोगों के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार तथा विशेषाधिकार ज्यों के त्यों बने रहेंगे । राजा की इस नीति का विरोध कुछ कुलीन तथा निम्न पादरी वर्ग के लोगों ने किया। राजा को सहयोग देने वाले उसके भाषण के पश्चात् सभा भवन से बाहर चले गये परन्तु जनसाधारण के प्रतिनिधि वहीं बैठे रहे। ऐसे समय में मिराबो ने साहसिक घोषणा कर जन प्रतिनिधियों का मार्ग दर्शन किया। मिराबो ने गरज कर कहा “हम यहाँ जनता की इच्छा से उपस्थित हुए हैं और जब तक बन्दूक की गोली से हमको नहीं हटाया जायेगा तब तक हम यहाँ से नहीं जायेगे। अधिवेशन के अध्यक्ष ने मिराबो की उक्त घोषणा की सूचना राजा को दे दी। राजा ने कहा “अगर वह बैठना चाहते हैं तो उन्हें बैठने दो।"

मिराबो की घोषणा


राजा की स्थिति बड़ी कठिन हो गई। दो दिन बाद बहुत से पादरी और कुलीन भी राष्ट्रीय समा में सम्मिलित हो गये । अन्त में राजा को परिस्थितियों के सामने झुकना पड़ा और उसने 27 जून को तीनों सदनों को एक साथ बैठने की अनुमति दे दी। इस प्रकार राष्ट्रीय सभा को वैधानिक मान्यता मिल गई। यह सर्वसाधारण वर्ग की पहली महत्वपूर्ण विजय थी। उसी समय राजा के हाथों से सत्ता निकल कर राष्ट्रीय सभा के हाथों में चली तीनों सदनों के साथ बैठने से राष्ट्रीय महासभा का महत्व बढ़ गया। उसने संविधान बनाने का कार्य अपने हाथ में लिया। 9 जुलाई को राष्ट्रीय सभा ने अपने आप को संविधान समा घोषित कर दिया। इस प्रकार नयी सामाजिक व्यवस्था का प्रवर्तन करने और उसके संवैधानिक आधार को तैयार करने के अपने कर्तव्य की घोषणा कर दी। राजा को राष्ट्रीय समा के इस निर्णय को स्वीकार करना पड़ा।


संविधान सभा को दबाने का प्रयास


राजा और समा दोनों ही एक दूसरे के प्रति शंकित थे। पेरिस की स्थिति बहुत उत्तेजक बन गयी थी। अकाल, बेकारी तथा जनप्रिय वक्ताओं के उत्तेजक भाषणों ने स्थिति को विस्फोटक बनाने में सहयोग दिया। उधर राजा पर कुलीनों और रानी का रहा था। अन्त में राजा ने संविधान सभा को दबाने का प्रयास किया। यह ताको अदूरदर्शिता का प्रमाण था। संविधान सभा के सदस्यों ने सैनिकों के बढ़ते हुए को देखते हुए अनुभव किया कि उनके लिए स्वतन्त्र रूप से कार्य करना सच्याच नहीं होगा। इस पर मिराबो के माध्यम से जुई को यह संदेश भेजा गया कि यह सैनिकों को वापस भेज दे।

इस पर राजा ने उत्तर दिया कि यदि प्रतिनिधि सैनिकों से अपील हो गये हैं तो पेरिस छोड़ कर चले जाये किन्तु प्रतिनिधि राजा को झमको के आगे के नहीं 11 जुलाई को लोकप्रिय वित्तमन्त्री नेकर को पदव्युत कर दिया गया और तत्काल देश छोड़ने के आदेश दिये गये। यह समाचार सम्पूर्ण पेरिस में बड़ी तेजी के साथ फैल गया और उत्तेजना का वातावरण बन गया। कामिल देमूले नामक पत्रकार और उस क्रान्तिकारियों ने पेरिस के लोगों को बहुत उत्तेजित किया और हथियार एकत्रित करके आगे बढ़ने को प्रेरित किया। 13 जुलाई को रोटी और शराब की दुकानों को लूटा गया यह अफवाह फैली कि सैनिकों को पेरिस भेजा जा रहा है। इससे उत्तेजित होकर लोगों ने शस्त्रास्त्र संग्रह करने का निर्णय किया। नगर में जहाँ भी शस्त्रास्त्र उपलब हो सकते थे वहाँ लूट खसोट कर भीड़ ने हथिया लिया।

बास्तोल के प्रशासक


14 जुलाई को सुबह से ही पेरिस का वातावरण बदला हुआ था। नगर में प्रशासन ठप्प हो चुका था। लोग सुबह से ही हथियारों की तलाश में घूम रहे थे। किसी ने यह अफवाह फैला दी कि बास्तोल के दुर्ग में शस्त्रों का भण्डार है और यह जानकर मोड़ उधर ही उमड़ पड़ी। बास्तोल पेरिस से थोड़ी ही दूरी पर छोटा सा किला था जहाँ प्राय राजनीतिक बन्दी रखे जाते थे। जनता इस किले को निरंकुशता एवं अत्याचार का गढ़ मानकर उससे घृणा करती थी। बास्तोल के प्रशासक ने अपने कुछ सैनिकों की सहायता से कुछ दूर तक भीड़ को रोकने का प्रयास किया परन्तु अन्त में उन्होंने समर्पण कर दिया। भीड़ किले में घुस गई और उसने सभी बन्दियों को रिहा करके किले को तहस-नहस कर डाला। किले के अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया। लोग यादगार के लिए यहाँ से लोहे और पत्थर के टुकड़े अपने-अपने घर ले गये और बास्तोल का नामोनिशान मिटा दिया ।


बास्तील के पतन


बास्तील के पतन से पेरिस में अपार हर्ष की लहर दौड़ गई। बास्तील का पतन वैसे कोई बड़ी घटना नहीं थी । एक मामूली किले पर उग्र भीड़ ने कब्जा करके उसको नष्ट कर दिया था, पर यह घटना बदले हुए समय के आगमन की पूर्व सूचना थी। जब राजा को बास्तील के पतन का समाचार मिला तो उसने कहा कि 'अरे! यह तो विद्रोह पास खड़े दरबारी ने कहा 'राजन् यह क्रान्ति है। सचमुख यह क्रान्ति का बिगुल था। बास्तील एक किला ही नहीं, एक सिद्धान्त और एक प्रतीक था। उसका पतन सिद्धान्त और परम्परा का पतन था।

राष्ट्रीय दिवस 14 जुलाई


बास्तील के पतन की घटना का फ्रांस के इतिहास में विशेष महत्व है। आज भी स में अपना राष्ट्रीय दिवस 14 जुलाई को ही मनाया जाता है। फ्रांस के चूचों राजाओं "पुरान सफेद झंडे के स्थान पर लाल, सफेद तथा नीले रंग का नया झंडा अपना लिया पा बास्तील के पतन को एकतन्त्र की पराजय और स्वतन्त्रता की जीत समझा गया।

"सारे क्रान्ति काल में कारतोस के पास सो रखो और गपूर याहारे परिणामों शाले अन्य कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं हुई ...इस दुर के पहर को केवल कार में हो गयी अपितु सारे संसार में स्वादाता के सह-सन्म का परिचायक आणा गया।

व्यवस्था का कारण रह नहीं था। इसका कारण सो हुई और था उस पर शासन था जिन्होंने युळे तथा स्वारी आमोद-प्रमोद में इस का अपाध्याय किया। इस शासकों के विपरीत तुई सोलहों अपेक्षाकृत एक स्टार शासक था।

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