Thursday, September 19, 2019

राष्ट्रीय सभा की महान् उपलब्धियों

राष्ट्रीय सभा की महान् उपलब्धियों


राष्ट्रीय समा ने पुराने कूड़े-कर्कट को साफ कर दिया था। इसने प्रणित सामन्ती अधिकारों का अन्त किया। देश में एकता स्थापित की। फांस को प्रथम लिखित संविधान प्रदान किया। नवीन संविधान द्वारा इसने जनता को सार्वभौमिकता स्थापित की। इसने नये राजनीतिक  दिन में लोकतन्त्र के लिए एक स्मारक खड़ा कर दिया था। राष्ट्रीय सभा ने जनता उत्साह को जागृत कर दिया आर इस बात का प्रयास किया कि देश में एक से कानून त हों तथा करों का बोझ सबके ऊपर एक-सा पड़े ।"इसने एक सामाजिक और सारिक क्रांति उत्पन्न कर दी थी और सार्वजनिक नीति का आधार जनता की इच्छा भाना था। इसने सब काल के लिए और सारी दुनिया के लिए एक नये सन्देश कीजनसाधारण के वैयक्तिक महत्व के संदेश की-उद्घोषणा कर दी थी।"

राष्ट्रीय सभा के कार्यों में दोष


राष्ट्रीय सभा की महान् उपलब्धियों के बावजूद उसकी आलोचना की जाती है। राष्ट्रीय सभा के कार्यों में कई दोष थे :

(i) इसने नागरिक अधिकारों की घोषणा कर जनता में ऐसी आशाएँ उत्पन्न कर दी, जिनको संविधान में स्वयं वह पूरी न कर सकी ।

( नागरिकों को सक्रिय तथा निष्क्रिय कोटि में विभाजित कर सभा ने मानव के अधिकारों की उल्लंघना की । मताधिकार सम्पत्ति पर आधारित कर हजारों लोगों को मतदान से वंचित कर दिया। इस प्रकार नागरिकों से न केवल समानता का अधिकार छीन लिया गया, वरन, पुराने विशेषाधिकारों की जगह नये विशेषाधिकार स्थापित कर दिये गये।

(iii) अतिविकेन्द्रीकरण की नीति अपनाने से केन्द्र की सरकार का स्थानीय अधिकारियों पर नियन्त्रण न रहा। इससे प्रशासन में शिथिलता आ गयी।

(iv) व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका को पृथक् कर दिया गया । राजा के मन्त्री व्यवस्थापिका के सदस्य नहीं हो सकते थे और व्यवस्थापिका के सदस्य राजा के मन्त्री नहीं हो सकते थे। राजा को व्यवस्थापिका को भंग करने का अधिकार नहीं था । इस प्रकार व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका एक दूसरे की सहायक नहीं, अपितु विरोधी बनी रहीं।

(v) निर्वाचन द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति करना अव्यावहारिक था। इससे वे निर्भय होकर न्याय नहीं कर सकते थे ।

(vi) जो व्यक्ति एक बार व्यवस्थापिका सभा का सदस्य हो जाता वह दूसरी बार उसका सदस्य नहीं हो सकता था। इस प्रकार अनुभव को उपेक्षित किया गया।

(vii) सिविल कांस्टीट्यूशन ऑफ दी क्लर्जी द्वारा देश भर में धर्म से जुड़े लोगों के मध्य राज्य के नियंत्रण के प्रश्न को लेकर तनाव उत्पन्न हो गया ।

(viii) इसने मध्यम श्रेणी के लोगों के हितों को सबसे अधिक प्रोत्साहन दिया । कृषकों एवं मजदूरों के हितों को उपेक्षित रखा गया।


राष्ट्रीय सभा के कार्यों का मूल्यांकन


राष्ट्रीय सभा के कार्यों की आलोचना करना सरल है किन्तु पुरानी अत्याचारपूर्ण यवस्था का विरोध करना कोई हँसी-खेल नहीं था। बड़ी निभीकता एवं अदम्य उत्साह के साथ इसने पुरानी व्यवस्था का विरोध किया। राष्ट्रीय सभा के कार्यों का मूल्यांकन परत समय हमें उन प्रतिकूल परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए जिनके मध्य का कार्य करना पड़ा। फिर इसके सदस्यों को वैधानिक तथा प्रशासनिक अनुभव भी प्राप्त नहीं था । इतिहासकार एच. जी. वैल्स का विचार है कि इस सभा का बहुत-सा रचनात्मक तथा चिस्थाई प्रकृति का था किन्तु इस सभा का बहुत-सा कार्य प्रायोगिक र अस्थायी सिद्ध हआ। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय संविधान जनता की सार्वभौमिक सत्ता, सामाजिक समानता, मानव अधिकारों की घोषणा. सामन्तवाद का अन्त आदेद्वार ति के सिद्धान्तों की स्थापना की तथापि वह स्थायी रूप से सादेधान लागू करने में असफल रही। राजनैतिक एवं आर्थिक समस्याओं को सुलझाने में सावधान सभा असमर्थ रहो. इसलिए अव्यवस्था फैली।

संविधान सभा


संविधान सभा रजा व्या राजतंत्र के विरुद्ध नहीं थी। यदि राजा संयम एवं दूरदर्शिता से कार लेता, जो नये सावधान के अन्तर्गत प्रतिष्ठापूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता था और अपने देश की सेवा कर सकता था। किन्तु उसने एक ऐसी मयेकर मूल कर दी जिससे उसका सर्वनाश ईशया बाललील के पतन के बाद फ्रांस के अनेक सामन्त देश छोड़कर भाग गये थे और पसी राज्यों में जाकर शरण ले ली थी। वे उन देशों की सरकार से मिल का मोर को कान्तिकारी सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे, उनमें राजा कामाई मौका न लोगों के बहकावे में आकर राजा ने फ्रांस से सपरिवार भागकर आस्ट्रिया पहुंचने की शेजना बनाई। 20 जून 1792 को लुई अपने परिवार के साथ वेश बदल कर रवाना हा परतु जब यह फ्रांस की सीमा पार करने वाला था उसी समय एक गुरुक ने उसे पहचान लिया एवं उसका रास्ता रोक दिया। उसे पेरिस लौटना पड़ा। इससे राजा बहुत बदनाम हुडा और देशदोही समझा जाने लगा।

नयी विधानसभा


नये संविधान के अनुसार राष्ट्रीय सांविधान सभा का विसर्जन कर नयी विधानसभा का निर्वाचन हजा। नव निर्वाचित विधानसभा में उन लोगों का बहुमत आया जो सांविधानिक राजतन के पहापातीधारे समझते दे कि क्रान्ति का काम पूरा हो गया और अब देशहित में नये सरिधान का क्रियान्दान होना चाहिये । किन्तु सभा में ऐसे सदस्यों की संख्या भी पर्याप्त योजो राजतन का जन्त करके गणतन्त्र कायम करना चाहते थे। गणतन्त्रवादियों के दो दल ये-जैकोदिन और जिरदिस्त । इनमें जैकोबिन दल के विचार अधिक उग्र और कोशिकारी है। उनके नेताओं में मारा होतो. रोजस्पियेर आदि प्रमुख थे।


नेपोलियन का उदय और उत्थान


नयी विधानसभा के सम्मुख एक समस्या थी-उन फ्रांसीसियों को नियन्त्रण में रखना, जो क्रान्ति विरोधी थे तथा उसे कुचलने का प्रयास कर रहे थे। इनमें बहुत से पादरी थे, जिन्होंने शई के सम्बन्ध में नवीन व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया था। इसके अलावा बहुत से कुलीन वर्ग के लोग दे, जो भाग कर विदेशों में चले गये थे। ये लोग विदेशों में क्रांति के विरोध में जनमत तैयार कर रहे थे और वहाँ के शासकों को फ्रांस पर आक्रममा करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। प्रशा एवं आस्ट्रिया ने यह घोषित किया कि फ्रांस से यूरोप के सभी राज्यों के लिए खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने अन्य राज्यों से भी सहयोग देने की मांग की। कान्ति की रक्षा के लिए फ्रांस को विदेशी शक्तियों से टकर लेनी पड़ी। फलतः एक ऐसे ऐतिहासिक युद्ध की शुरुआत हुई, जिसने शान्ति को सर्वदा नवीन दिशा प्रदान को, जिसका यूरोप के इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा । इसके कारण फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना हुई. फिर आतेक राज्य कायम हुआ जिसकी पृष्ठभूमि में नेपोलियन का उदय और उत्थान हो सका।

फ्रांस ने 20 अप्रैल, 1792 को आस्ट्रिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। युद्ध की घोषणा ने क्रांति का रूप बदल दिया। युद्ध के आरम्भ होते ही पेरिस की क्रान्तिकारी रकार ने बहुत से लोगों को जो क्रान्ति के शत्रु समझे जाते थे, गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया। जैसी ही विदेशी सेनाओं ने फ्राँस की भूमि में प्रवेश किया इन सब बन्दिया की हत्या कर दी गई जिससे वे शत्रुओं से मिलकर देश के खिलाफ षड्यन्त्र न रच सकें और राजा और उसके परिवार को बन्दी बना लिया गया। राज पद समाप्त कर दिया गया देश का नया संविधान बनाने के लिए राष्ट्रीय कन्वेन्शन (राष्ट्रीय सम्मेलन) का चुनाव कराया गया।

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