Monday, September 2, 2019

न्याय के क्षेत्र में अव्यवस्था एवं अष्टाचार

न्याय के क्षेत्र में अव्यवस्था एवं अष्टाचार


शासन के अन्य अंगों की भाँति कानून और न्याय के क्षेत्र में अव्यवस्था एवं अष्टाचार व्याप्त था। देश में कानूनों की कोई एक प्रामाणिक संहिता नहीं थी। पूरे देश में लगभग 385 प्रकार के न्याय-विधान प्रचलित थे। "एक कस्बे में जो बात कानूनी और सही मानी जाती थी वही बात उस स्थान से 5 मील की दूरी पर स्थित दूसरे कस्बे में गैर कानूनी समझी जाती थी।" फ्रांस में प्रचलित कानूनों की भिन्नता के सम्बन्ध में प्रसिद्ध प्रबुद्धवादी विचारक वाल्तेयर ने कहा था "किसी व्यक्ति को फ्रांस में यात्रा करते समय सरकारी कानून उसी प्रकार बदलते हुए मिलते हैं, जिस प्रकार उसकी गाड़ी के घोड़े बदलते हैं।" वहाँ कौन-सा कानून लागू होगा कोई नहीं जानता था।

न्यायालयों के क्षेत्राधिकार


देश में कई प्रकार के न्यायालय थे किन्तु इन न्यायालयों के क्षेत्राधिकार अस्पष्ट थे। अतः यह ज्ञात करना मुश्किल था कि कौन से न्यायालय में किस विवाद का निर्णय होगा। न्यायिक पदों को बेचने की परम्परा से न्यायिक व्यवस्था बदतर हो गई थी। पैसे पर आधारित व्यवस्था में तीसरे वर्ग के लोग तो न्याय की आशा ही नहीं कर सकते थे। राजा की विशेष मुद्रा वाले पत्रों द्वारा किसी भी व्यक्ति को बिना अभियोग के जेल में डाल दिया जाता था । दिदरो और वाल्तेयर जैसे विचारकों को बास्तील के दुर्ग में कैद की सजा भुगतनी पड़ी थी। दण्ड व्यवस्था कठोर एवं पक्षपातपूर्ण थी। कुछ अपराधों के लिए कुलीन वर्ग के लोगों को किसी प्रकार की सजा नहीं मिलती थी। किसी-किसी मामले में जागीरदार न्यायाधीश का काम करने के साथ-साथ वादी अथवा प्रतिवादी का काम भी कर सकता था। न्याय प्रणाली की एक बुराई यह भी थी कि अदालतों की भाषा लैटिन थी जिसे फ्रांसीसी भाषा जानने वाली आम जनता समझ न पाती थी। सामाजिक व्यवस्था काशन फ्रांसीसी समाज विषम एवं विघटित था ।


सामन्तवादी पद्धति, असमानता और विशेषाधिकार के मूलभूत सिद्धान्तों


वह सामन्तवादी पद्धति, असमानता और विशेषाधिकार के मूलभूत सिद्धान्तों पर आधारित था। समाज मुख्यतः तीन दर्गों में विभक्त था-पादरी, कुलीन वर्ग और सर्वसाधारण वर्ग। उच्च पादरी (प्रथम एस्टेट) एवं कुलीन (द्वितीय एस्टेट) सुविधा प्राप्त वर्ग थे और कृषक, मजदूर तथा मध्यम श्रेणी के लोग (तृतीय एस्टेट) सुविधाहीन वर्ग में थे। प्रत्येक वर्ग के भीतर विभिन्न श्रेणियों के बीच अधिकारों एवं सुविधाओं की दृष्टि से भारी विषमताएँ थीं । "फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था का आधार कोई विधान या कानून नहीं वरन् विशेषाधिकार, रियायतें और छूट थी। इस प्रकार की व्यवस्था के फलस्वरूप जनजीवन में संशय, अविश्वास एवं असंतोष ही पनप सकता था ।

फ्रांस की कुल जनसंख्या के अनुपात में विशेषाधिकार


यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि फ्रांस की कुल जनसंख्या के अनुपात में विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग के लोगों की संख्या एक प्रतिशत से अधिक नहीं थी। क्रान्ति से पूर्व फ्रांस की कुल जनसंख्या ढाई करोड़ थी, जिनमें से लगभग डेढ़ लाख पादरी और लगभग एक लाख चालीस हजार सामन्त थे। इतनी कम जनसंख्या होते हुए भी उच्च वर्ग के लोग अधिकारी, सुविधाओं एवं जीवन स्तर की दृष्टि से शेष 99 प्रतिशत देशवासियों से बहुत आगे थे। अनुमान लगाया गया है कि जागीरदारों एवं चर्च के धर्माधिकारियों में प्रत्येक के पास फ्रांस की समस्त सम्पत्ति का पाचवाँ भाग था। फिर भी ये दोनों वर्ग कर से मुक्त थे और साधनहीन तृतीय वर्ग के लोगों को करों से लाद दिया गया था।

इन दोनों वर्गों को प्रदत्त विशेषाधिकारों ने जनसामान्य को विरोधी बना दिया । अगर राजा विशेषाधिकार का प्रश्न हल कर देता और मध्यमवर्ग को उचित स्थान दिला देता, तो शायद क्रान्ति नहीं होती । नेपोलियन ने ठीक ही कहा था कि मध्यमवर्ग का अहंभाव ही क्रान्ति का असली कारण था; स्वतन्त्रता तो एक बहाना मात्र थी। इतिहासकार मेरियट का मत है कि “वास्तव में जब क्रान्ति हुई तो वह मुख्यतः राजा के निरंकुश एकतन्त्र के विरुद्ध नहीं, वरन् विशेषाधिकारों से युक्त वाँ-कुलीन व पुरोहित के विरूद्ध थी और क्रान्तिकारियों ने आरम्भ में उन्हीं को ही समाप्त किया "

(क) पादरी


फ्रांस की अधिकांश जनता रोमन कैथोलिक मतावलम्बी थी। अतः कै थोलिक चर्च का काफी प्रभाव था। उसका अपना देशव्यापी संगठन था। उसके पास अतुल सम्पत्ति थी और परम्परा के अनुसार वह राज्य के करों से मुक्त था। इसके साथ ही शिक्षा, जन्ममृत्यु के आंकड़े, विवाह एवं अन्य सामाजिक और धार्मिक संस्कारों आदि पर पादरियों का एकाधिकार-सा था। उसे पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं के अभिवेचन (सैंसर) करने का अधिकार था। चर्च के पृथक् न्यायालय और कानून थे। उसके व्यापक अधिकारों एवं प्रभाव के कारण ही यह कहा गया है कि फ्रांस का चर्च “राज्य के अन्दर राज्य” था।


फ्रांस की सम्पूर्ण जागीरी भूमि


फ्रांस की सम्पूर्ण जागीरी भूमि की बीस प्रतिशत भूमि चर्च के अधीन थी, जिससे चर्च की बहुत अधिक आय होती थी। इसके अलावा चर्च किसानों से सब प्रकार की फसलों पर धर्माश" (एक प्रकार का धार्मिक कर) भी वसूल करता था । अनुमानतः चर्च की वार्षिक आय राजकीय आय से आधी थी । यद्यपि चर्च इस आय का कुछ भाग धार्मिक कार्यों, जनहित तथा शिक्षा के प्रसार में खर्च करता था किन्तु चर्च के भीतर घोर पक्षपात एवं अपव्ययता का बोलबाला था । अठारहवीं शताब्दी में चर्च बहुत अधिक बदनाम एवं अलोकप्रिय हो गया था। लोगों की नजर में खटकने वाली बात यह थी कि चर्च की बढ़ती हुई सम्पदा के साथ पादरी अपने धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा करते जा रहे थे । चर्च की अलोकप्रियता का एक मुख्य कारण फ्रांस के मध्यम वर्ग के व्यक्तियों में लोकप्रिय होती हुई संशयवाद की प्रवृत्ति थी जिसके प्रभाव से ईश्वर का अस्तित्व तथा चर्च की उपयोगिता दानी ही विवाद के विषय बन गये थे। दूसरा कारण, चर्च के सामन्तीय अधिकार तथा उनका कठोरता से लागू किया जाना था जिसके कारण किसानों में चर्च के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न होने लगा।

पादरियों में भी दो श्रेणियाँ थीं-


() उच्च पादरी (1) सामान्य पादरी। उच्च पादरी वग में आर्कबिशप, ऐबे आदि पद थे। ये प्रायः कुलीनों के पुत्र होते थे। इनकी आमदनी बहुत थी और ये शान-शौकत एवं आराम का जीवन बिताते थे।“ धार्मिक कार्यों में उनकी रुचि बहुत कम थी और उनमें से अधिकांश अपने धार्मिक कार्यक्षेत्र को छोड़कर राज दरबार में रहकर भोग विलास का जीवन व्यतीत करते थे। वे ईश्वर के अस्तित्व तक में विश्वास नहीं रखते थे। एक बार लुई सोलहवें ने पेरिस के आर्कबिशप की नियुक्ति करते समय कहा था- “कम से कम पेरिस में तो हमको एक ऐसा आर्कबिशप रखना है, जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखता हो ।" इस श्रेणी के लोग सामान्य पादरियों को हेय समझते थे। यह उच्च पुरोहित वर्ग धर्म के आदर्शों को भूलकर प्रष्ट एवं विलासमय जीवन । बिता रहा था, जिससे जनता में उनके प्रति श्रद्धा के स्थान पर असंतोष एवं विरोध की भावना बढ़ रही थी।

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