Tuesday, October 1, 2019

वर्तमान भारत के लिए उपयुक्त लक्ष्यों का निर्धारण करते समय आप किन बातों का ध्यान रखना चाहेंगे ?

वर्तमान भारत के लिए उपयुक्त लक्ष्यों का निर्धारण करते समय आप किन बातों का ध्यान रखना चाहेंगे ?


कार्य स्थल में राष्ट्रीय चेतना की कमी के कारण आतंककारी व विघटनकारी शक्तियां प्रभावी हो रही हैं। शिक्षा के विभिन्न अंगों दवारा राष्ट्रीय चेतना के विकास हेतु प्रयत्न कर राष्ट्रीय निष्ठा को व्यावहारिक धरातल दिया जाना चाहिए | जो वर्तमान भारत राष्ट्र की सर्वोत्तम आकांक्षा है । इसे शिक्षा मान्य लक्ष्य ग्रहण किया जाना चाहिए ।

6.3.13 राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग और संरक्षण


प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और संरक्षण में विकासशील देश पिछड़े हुए हैं भारत की यह जटिल समस्या है संसाधनों के दोहन के नाम पर प्रकृति के साथ अनाचार भावी पीढियों के लिए विकट समस्या उत्पन्न करेगा । जैसे जंगलों की कटान, पानी का दोहन खदानों द्वारा भूमि को खोखला किया जाना । ये वे बिन्दु है जिनसे आज की पीढी तो आनंदमग्न है, बहु लता में उसका दुरूपयोग कर रही हैं । लेकिन जब संसाधन समाप्त हो जायेगे तो भावी पीढ़ी के लिए जीवन निर्वाह असंभव हो जायेगा । इसके लिए संसाधनों के संरक्षण के साथ दोहन को प्रेरित व प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक है जिसकी प्राप्ति शिक्षा दवारा ही संभव है ।।

6.3.14 जनसंख्या नियंत्रण व मानव संसाधन का नियोजन ।


जन विस्फोट विश्व की विकासमान अर्थ व्यवस्थाओं की राष्ट्रीय समस्या है । असीमित जनवृद्धि राष्ट्रीय नकरात्मक विकास को प्रेरित करती है, संसाधनों के अधिग्रहण में संघर्ष की स्थिति बनने से राष्ट्र का पराभव हो जाता हैं अत: शिक्षा के विभिन्न आयामों द्वारा 'जनसंख्या नियंत्रण - हेतु संचेतना का विकास किया जाना चाहिए । साथ ही उपलब्ध जनशक्ति को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाय कि राष्ट्रीय निर्माण में उनकी समुचित भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

6.3.15 पर्यावरण संचेतना का विकास


राष्ट्र अपने पर्यावरण में ही विकसित होता है यदि विकास के नाम पर जल, थल, वायु तभी को प्रदूषित कर दिया जायेगा तो राष्ट्रीय जीवन रोग ग्रस्त होकर पीडित होगा । अत: विकास के पर्यावरण प्रेमी मॉडलों पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए, संचार और ऊर्जा के पाश्चात्य मॉडल वर्तमान पर्यावरण के लिए विषवृक्ष बन गये है यदि इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में राष्ट्रीय जीवन पंगु हो जायेगा । अत: प्रत्येक व्यक्ति में पर्यावरण चेतना का विकास करना होगा । प्रकृति के साथ सहचर्य के सिद्धान्त के व्यवहार रूप में शिक्षा द्वारा है। परिणत किया जा सकता हैं अत: राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा द्वारा पर्यावरणीय संचेतना का विकास एक अनिवार्य उद्देश्य के रूप में होना चाहिए ।


6.3.16 समान आर्थिक विकास


भारत आज विकसित अर्थव्यवस्था में प्रवेश कर चुका है परन्तु असमान आर्थिक विकास जो नियोजन की कमियों का परिणाम हैं । गरीबी और बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त है देश की मजबूत अर्थव्यवस्था में भुखमरी बेरोजगारी एक जटिल समस्या है क्योंकि औपनिवेशिक, शिक्षा प्रणाली में आमजन के होने में बी.ए., एम.ए. की साधारण शिक्षा आती है वह स्नातक व परास्नातक बेरोजगार कहा जाता है इसके निवारण के लिए शिक्षा में जो भी सुधार किये गये वे सिर्फ पेबन्द के रूप में हैं सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली औपनिवेशिक और अभिजात्य स्वरूप को बदलने का प्रयत्न अभी तक नहीं किया गया । लेकिन लोकतांत्रिक देश होने के कारण बेरोजगारी और गरीबी की विकट समस्या का समाधान शिक्षा के माध्यम से ही तलाशना होगा । शिक्षा के विभिन्न अंगों द्वारा इस समस्या के समाधान का प्रयास इसे अपना प्रमुख उद्देश्य बना कर करना पड़ेगा ।

6.4 शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक तत्व


समग्र रूप में शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति का संस्कार होता है । समाज और राष्ट्र के अनुकूल उसके व्यवहारों में परिमार्जन होता है, जो शिक्षा द्वारा ही किया जाता है । परन्तु भारतीय सन्दर्भ में देखे तो शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रतिशत बहुत न्यून है इसके कई कारण है जिनका सांगोपांग अध्ययन करना उद्देश्यों के साथ आवश्यक है ।

शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक, पाठ्यक्रम और विद्यार्थी होते है, शिक्षक और पाठ्यक्रम के साथ शिक्षार्थी की अन्तःक्रिया द्वारा विद्यार्थी का शोधन या संस्कार होता है। सर्वप्रथम उसके विचारों में स्पष्टता फिर व्यवहारों में परिमार्जन होता है । परन्तु यह तभी संभव होता है जब विद्यार्थी कुशल और विज्ञ शिक्षक के साथ पाठ्यक्रम में प्रवेश करे | दुर्भाग्य से परीक्षा प्रधान और नौकरी प्रधान शिक्षा व्यवस्था में बालक और पाठ्यक्रम के बीच अन्तःक्रिया का अवकाश ही नहीं बचता है । विद्यार्थी सिर्फ परीक्षा के लिए पढ़ता है और परीक्षा सिर्फ नौकरी प्राप्ति के लिए होती है । शिक्षक भी परीक्षा की तैयारी का एक माध्यम बन गया है । इसीलिए कोचिंग संस्थान, गाइड, कुन्जी, वनवीक सीरिज संस्थागत व्यवसाय बन गये है । परिणाम स्वरुप शिक्षार्थी शिक्षा से दूर जा रहा है । वह पाठ्यक्रम को कूद कर पार कर लेता है। वह पाठ्यक्रम के अधिकांश भाग का स्पर्शही नहीं करता और कक्षा स्तर पार कर स्नातक, परास्नातक बन जाता है । अत: शिक्षा की शोधन क्रिया विद्यार्थी के व्यवहार का परिमार्जन नहीं कर पाती । इसलिए शिक्षा के उद्देश्य प्राप्त नहीं होते । विभिन्न शिक्षा नीतियों में शिक्षा को नौकरी से पृथक करने की संस्तुति की गई है परन्तु व्यवहारिक रूप से यह असंभव रहा है ।


शिक्षा के उद्देश्यों को शिक्षा के मूल्यों के रूप में परिमार्जन


अतः शिक्षा के उद्देश्यों को शिक्षा के मूल्यों के रूप में प्राप्त करने के लिए कुछ सुझाव नीचे दिये जा रहें है :
(i) समाज के योग्यतम व्यक्तियों को शिक्षण का दायित्व प्राप्त हो । इसके लिए शिक्षण व्यवसाय को श्रेष्ठतम महत्ता प्राप्त होनी चाहिए | शिक्षा की नौकरी प्रधान, डिग्री प्रधान प्रवृत्ति को समाप्त किया जाय । इसके स्थान पर
चरित्र प्रधान, कुशलता प्रधान प्रवृत्ति का विकास किया जाना चाहिए ।
(iii) कोचिंग, कुन्जी, सीरीज परम्परा का निषेध किया जाना चाहिए |
(iv) शिक्षा के स्तरों में मूल्यांकन व्यावसायिक व चारित्रिक कुशलताओं पर आधारित किया जाना चाहिए ।
(v) पाठ्यक्रम का संगठन सूचनाओं के आधार पर न होना चरित्र व व्यवहार के नियामक तत्वों के आधार पर होनी चाहिए ।
(vi) परम्परागत स्पर्धा प्रधान प्रणाली के स्थान पर समता प्रधान शिक्षा प्रणाली को जन्म दिया जाना चाहिए ।
(vii) पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली का अंधानुकरण समाप्त हो । बल्कि शिक्षा के संगठन की स्थापना चीन व जापान तथा अमेरिकी शिक्षा प्रणाली के अनुसार होनी चाहिए ।
(viii) शिक्षा के साथ निर्देशन सेवाओं के अनिवार्य रूप से सक्रिय किया जाना चाहिए ।
(ix) शिक्षा में शोध स्तर को सुधार किया जाना चाहिए ।
(x) शिक्षा शास्त्र के संघ और लोक सेवा आयोगों में एक विषय के रुप में स्थापित किया जाना चाहिए।

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