नेपोलियन सामाजिक संविदा

नेपोलियन सामाजिक संविदा

नेपोलियन ने सत्य का जन्म न होता तो फ्रॉस की राज्य क्रान्ति का होना असम्भव का सबसे शक्तिशाली नेता रोब्सपियर उसे मसीहा और ‘सामा। ग्रन्थ की तरह मानता था। और ग्रन्थ कशाली नेता रोपित का होना असम्भव था।” क्रान्ति का किया और ‘सामाजिक संविदा को ‘

इस प्रकार रूसो “अशान्त आत्माओं का अमर अपवाहक: जिस किसी को यह शक हो कि उसे गलत समझा जा रहा है और अधिकारों से वंचित किया जा रहा है उसका प्रवक्ता; आत्माभिव्यक्ति के नये स्वच्छंदतावाद का दार्शनिक; सन्तोष का मसीहा; लौकिक मुक्ति का उग्र देवदूत; धर्म निरपेक्ष समाज के आगामी युग का वैतालिक बन गया।

धर्म निरपेक्ष समाज के आगामी युग का

दिदरो-फ्रांस के दिदरों ने समस्त पुरातन संस्थाओं का विरोध किया । वह यह कहा करता था कि निरंकुश राजाओं और पादरियों ने संसार में सबसे अधिक कटुता उत्पन्न की । उसने अनेक विद्वानों का सहयोग प्राप्त करके एक विशाल विश्वकोश को सम्पादित किया। सत्रह खण्डों में प्रकाशित यह विश्वकोश 1772 में दिदरो के अथक परिश्रम के पश्चात् पूर्ण हुआ। इसमें कुल 16,288 पृष्ठ हैं । यह विश्वकोश केवल तथ्यों का संकलन मात्र नहीं था। अपने समय के प्रख्यात विद्वानों द्वारा महत्वपूर्ण विषयों पर लेख इसमें शामिल किये गये थे। कुछ विषयों पर स्वयं दिदरो ने लेख लिखे थे । इस विश्वकोश के प्रकाशन में डी एलम्बर्ट ने भी योग दिया था । विश्वकोश में शान्ति, प्राकृतिक विज्ञान और मजदूरों तथा व्यापारियों की उपलब्धियों की प्रशंसा की गई थी। इसमें गुलामों के व्यापार, धार्मिक असहिष्णुता, धार्मिक अन्धविश्वास, पादरियों के भ्रष्ट जीवन, अनुचित करों और अभिजात वर्ग तथा चर्च के विशेषाधिकारों की निन्दा की गई। सबसे बढ़कर, इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि सरकारों को जन-साधारण के कल्याण में वृद्धि करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए । दिदरो के निर्भीक विचारों से सरकार डर गई. परिणामस्वरूप 1752 में इसके दो खण्डों के प्रकाशन के पश्चात् राजा द्वारा इसके छापने और बेचने पर रोक लगा दी गई । दिदरो को फ्रांस से भागना पड़ा । ग्रन्थ के अधिकांश खण्ड फ्रांस के बाहर प्रकाशित हुए । बाद में फ्रांस में प्रकाशन का अधिकार पुनः मिल गया । दिदरो के विश्वकोश ने समाज में तर्कवाद का खूब प्रसार किया । यह विश्वकोश मध्यवर्गीय लोगों के प्रशिक्षण और परिवर्तन के लिए अनुकुल मानसिकता का निर्माण करने में सहायक सिद्ध हुआ।

विश्वकोश में शान्ति, प्राकृतिक विज्ञान और मजदूरों तथा व्यापारियों की उपलब्धियों की प्रशंसा

भू-अर्थशास्त्री-क्वेसने फ्रांस के तत्कालीन भू-अर्थशास्त्रियों (फिजियोक्रेट्स) का नता था । भू-अर्थशास्त्री व्यापार के स्थान पर भूमि और कृषि को ही धन का स्रोत मानते थ। उनके अनुसार व्यापार में केवल स्थान परिवर्तन के कारण वस्तु का मूल्य बढ़ जाता है। परन्तु वह धन का उत्पादन नहीं है। वास्तव में धन का मूल स्रोत प्रकृति है, जहाँ से मनुष्य कृषि, मछली, खनिज सम्पत्ति तथा फलों के माध्यम से धन प्राप्त करता है। पाणिज्यवाद के विचारों के विरुद्ध भू-अर्थशास्त्रियों में राज्य के प्रतिबन्ध हटाकर उन्मुक्त व्यापार का सिद्धान्त प्रतिपादित किया । क्वेसने की यह निश्चित मान्यता थी कि उत्पादन क्षत्र में राज्य का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उसका विचार था कि किसानों पर करों का आधिक बोझ नहीं होना चाहिए। वह यह मानता था कि यदि कृषक दरिद्र ह तो राज्य भार राजा भी दरिद्र होगें । उसने तथा उसके अनुयायियों, जैसे-गुरने, नेमूर आदि ने १पका का पक्ष लेकर फ्रांस की गिरती हुई अर्थव्यवस्था की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

सो के जन्म से कुछ पहले है। अधिकार के बारे में बहुत ही काल के बाहर के मुखवादी निक जॉन लॉक 40 जिसकी हुईबी ने जनता के अपनी सरकार बनाने बिगाड़ने के अधिकार कि अधिकार प्राप्त है जीवन, स्वतन्त्र का प्रयोग करके मनुष्य ने अपने इन प्राकृतिक कहा कि जब सरकार अपने इस चालक के अनुसार हर व्यक्ति को कुछ प्राकृतिक आधकार प्राप्त है जीवन और निजी सम्पति के अधिकार । अपनी बुद्धि का प्रयोग करके मनुष्य ने अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार बनाई। लोक ने कहा कि जर सर स्त्तव्य का पालन न कर सके तब जनता को उसे उखाड़ फैकने का अधिकार कारणों से उसने इंग्लैण्ड की शानदार कान्ति’ को उचित ठहराया। जब थॉमस से अमेरिका को क्राति के लिए स्वतन्त्रता की घोषणा लिखी, तब उसने व्यवहार को उक्तियों को हो उहत कर दिया।

फ्रांस की गिरती हुई अर्थव्यवस्था

एउम लिथ (1722-1790 ई.) नामक एक स्कॉट ने राष्ट्र की समृद्धि के लिए व्यवसाय को स्वाधीनता पर जोर दिया। उसने कहा कि व्यवसायियों को कोई भी धंधा करने को एट देनी चाहिये और मजदूरों को कोई भी नौकरी करने की। कीमत और किस्म का नियोग व्यवसायों में प्रतियोगिता द्वारा होना चाहिए न कि सरकारी नियमों द्वारा । मिया का अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसे आधुनिक अर्थशास्त्र का जन्मदार माना जाता है। उसके द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक ‘दि वैल्थ ऑफ नेशन्स ( सम्पति का यही सार तत्व है। उसकी अहस्तक्षेप (लेसेज फेयर) की नात का सदी के व्यवसायियों में काफी लोकप्रिय हुई । व्यवसाय पर लगे सरकार के पायया की इच्छा अमेरिकी और फ्रांसीसी दोनों क्रान्तियों का एक महत्वपूर्ण कारण थी। अमन दानिक काण्ट (1724-1804 ई.) ने भौद्धिक क्रान्ति को यह पायरियावद अपनी समझ का उपयोग करने का साहस का साहस करो।

राष्ट्र की समृद्धि के लिए व्यवसाय को स्वाधीनता पर जोर

अमेरिकी शोभा है कि मानव मस्तिष पर किसी भी प्रकार के उत्पीड़न का मैं अन्तिम दम तक। स्म लेने वाले एक विश्व नागरिक टॉमस पेन (1737-11 देकर समस्त मानव मेरे का है और भलाई करना मेरा धर्म। जिस किसी भी देश में आजादी नहीं है वही वह उसके लिए की विस्तार में अनेक ऐसे रददादीहए जो दुराइयों के वैदिक शान्ति की भावना सारे पूरोप में फैला दी। ना मेरा धर्म। उसका आग्रह या लिए सदा लडेगा। अब जापुराइयों के विरुद्ध लड़े और रक म भी उसके प्रभाव से बंचित न रहे। पर पुरोपियन पर रहे। अयपि इस युग के कानून मानते थे पर हा था। अवारहवीं सदी में अनेक राजा एवं शासक हुए जिन्होंने अपने देशों की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को नये विचारों के अनुसार परिवर्तित करने का प्रयत्न किया । प्रबोधन का एक सामान्य प्रभाव प्रशासनिक सुधारों के रूप में देखा जा सकता है। इन सुधारों के अन्तर्गत शासन के कार्य अधीनस्थ शाखाओं में स्पष्ट रूप से विभाजित कर दिए गए ।

कानूनी कार्यप्रणाली में एकरूपता लाने, कानूनों की संहिता बनाने, नई सांख्यिकीय विधियों के विकास और कर-पद्धति के न्याय संगत संशोधन में प्रबोधन के प्रभाव को देखा जा सकता है । ये सुधार शासकों की अधीनता में केन्द्रीकृत प्रशासनिक-तन्त्र द्वारा किए गए। इतिहासकार लार्ड एक्टन ने प्रबुद्ध निरंकुशता के सम्बन्ध में लिखा है कि “सप्तवर्षीय युद्ध के उपरान्त, महाद्वीप के शान्तिमय वातावरण में यूरोप की राजनीति में एक महान् परिवर्तन हुआ।

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