बास्तोल पर क्रांतिकारियों का अधिकार

बास्तोल पर क्रांतिकारियों का अधिकार

“घटनाओं को दिशा देने की बजाय, बाइ स्वाय धापा के साथ बाइ जाता था।” समस्त चूाँ राजाओं के समान उस पार भी उसकी पाली मेयी झाल्चालेत का बहुत प्रभाव था। वह आस्ट्रिया के
खाट जोसफ द्वितीय को बाहान और दिवमल महापानी पिया ओरीसा की पुत्री थी। यद्यपि उसमें निर्णय लेने की क्षमता यो किन्तु दाइ आयमानी, जिदी, विवेकहीन एवं फिजूलखर्च महिला दी। राज्य कार्यों के संचालन का उपते कोई अनुष्यय न था। वह लुई को न तो सही सलाह दे सकती थी और न ही उसके प्रेम करते हुए उसके हित की बात सोच सकती थे। वह सदा लोनी चाटुकारों से मिली राहतो यो जो उस समय की व्यवस्था से साम उठाने में नहीं चूकते हैं। राजकरयों में उसके अनावश्यक इस्तक्षेप के कारण शासन की कठिनाइयों में वृद्धि हुई। इतिहासकार एच.ए.एल. फिशर ने रानी आंचानेत के क्रांति के सम्बन्ध में उतरदायित्व पर लिखा है, “आलोचकों को वह ऐसे साइरिन (भोपू) के समान प्रतीत होती थी, जो कि राज्य रूपी जहाज को चट्टानों की ओर ले जा रहा हो।”

समाज सेविका एवं सुरुचि संपन्न

किंतु प्रसिद्ध इतिहासकार दिसेंट कोनेन के विचारों में पास के राजा लुई सेज़ (सोलहद) और उसकी रानी बेटी आल्यानेत (मायो आलुजानेल) का इतिहासकारों ने जितना गलत चित्रण किया है उतना शायद ही अन्य किसी राजा-रानी का किया गया हो। विद्वान लेखक लिखता है कि मामला सामी इलेवलकार राजा-बानी का निष्पक्ष एवं संतुलित वर्णन कर पाने में असफल रहे। इतिहासकारों के अनुसार परिस के दुर्ग और जेल बास्तोल पर क्रांतिकारियों का अधिकार हो जाने से तुई ने अपनी डायरे में रोया कुछ नहीं) लिखा था। यह लिखने के लिए इलेहासकारों ने उसे गवार बताया है। लेकिन जैसा क्रोनिन को मान्यता है सत्य यह है कि यह तुई के शिकार को डायरी थी और उस दिन वह शिकार खेलने नहीं गया था।

क्रोनिन को मान्यता

इसी तरह मेरी आचानेत के बारे में प्रसिद्ध है उसने ‘रोटी माँगने वालों से कहा या केक क्यों नहीं खाते। वस्तुतः कोनिन के विचारों में, ये शद आंत्वानेत ने नहीं कहे ये बहुद समावना इस बात की है कि लुई चौदह की पत्नी ने यह बात कही हो। तुईने अपने मात्रमण्डल को पहली बैठक में घोषणा की थी. मैं उन सब बातों को पूरी जानकारी प्राप्त करना चाहता हूँ जो मेरे राज्य को समृद्धि से संबद्ध है। तुई राजकाज में इतना अधिक सूब गया कि उसकी पत्नी उससे दिन में बात भी नहीं कर पाती थी। मेरी झाल्यानेत जरूरतमंद लोगों को मदद किया करती थी। उसकी देखा-देखी गरीबों को सहायता करता फैशन बन गया।

तुई ने अपनी पत्नी को यह स्पष्ट कह रखा था कि वह उसे किसी भी हालत में राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करने देगा। क्रोनिन आगे लिखते हैं कि ईकालेदशी सुधारक था और वह कोस को आधुनिक बनाने के लिए प्रयत्नशील या तथा मेरी चालेल रही समर्पिता को समाज सेविका एवं सुरुचि संपन्न महिला यौ। मित्रों और दरबारियों के विश्वासघात झूठी अफवाई. लुई की धार्मिक उदारता, लुई पन्द्रह का कुशासन पादरियों के प्रति उसका कठोर रवैया. कुछ शरारती लोगों द्वारा भीड़ को सड़काला, असंतुष्ट राजनीतिज्ञों को कार्यवाहियों, वकीलों की भूमिका, तुई में हाज़िरजवाबी का न होला तथा झोताओं को मंत्रमुग्ध न कर सकने  की क्षमता, आर्थिक दृष्टि से फ्रांस का दीवालिया होना, लुई द्वारा फ्रांस को घाटे से निकालने के प्रयासों का निहित स्वार्थों द्वारा विरोध, लुई की गलतियाँ, सामाजिक असमानता आदि कारणों ने मिलकर फ्रांस में क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया, ऐसे विचार, इतिहासविद् क्रोनिन ने अपनी पुस्तक ‘लुई और आंत्वानेत’ में व्यक्त किए हैं।

लुई पन्द्रह का कुशासन

किंतु साधारणतः यह माना जाता है कि फ्रांस के राजाओं की शान-शौकत एवं विलासिता पर कोई अंकुश न था। राजा, रानी और उनके सम्बन्धी तथा कृपापात्र फ्रांस की राजधानी पेरिस से बाहर बारह मील दूर वर्साय के विशाल प्रासादों में ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। यूरोप के अन्य राजाओं के लिए वर्साय के महल अपने वैभव की वजह से ईर्ष्या का कारण बने हुए थे। वर्साय में 18,000 व्यक्ति निवास करते थे जिनमें 16,000 केवल नौकर-चाकर ही थे। अन्य लोगों में राज परिवार के लोग एवं उनके अतिथि और राजा के कृपापात्र सामन्त लोग थे । अकेली रानी के 500 नौकर थे। वस्तुतः वर्साय में विलासिता एवं शान-शौकत का कोई अन्त न था । राजा और रानी अपने कृपापात्रों को खुले हाथ अनाप-शनाप धन का वितरण किया करते थे। ऐसा अनुमान है कि क्रान्ति के पूर्व वर्साय में होने वाला खर्चा 200 लाख डालर प्रतिवर्ष था । जनता की कमाई को पानी की तरह वर्साय में बहाया जाता था । बहुत अधिक अपव्ययता के कारण दरबार को “राष्ट्र की समाधि” कहा जाने लगा था।

क्रान्ति से पूर्व फ्रांस की शासन प्रणाली

क्रान्ति से पूर्व फ्रांस की शासन प्रणाली अक्षम, अव्यवस्थित, भ्रष्ट और खर्चीली थी। एकरूपता का अभाव फ्रांस की शासन व्यवस्था की बहुत बड़ी कमजोरी थी। शासन का प्रमुख राजा था। उसकी सहायता के लिए पाँच समितियाँ थीं जो कानून बनाती, राजा की तरफ से आदेश जारी करती तथा राज्य के घरेलू तथा वैदेशिक मामलों की देखभाल करती थीं। प्रान्तीय शासन के लिए समस्त देश दो प्रकार के प्रान्तों में बँटा हुआ था। एक प्रकार के प्रान्त गवर्नमेन्ट कहलाते थे, जिनकी संख्या 40 थी।

इनमें अधिकांश फ्रांस के प्राचीन प्रान्त थे और उनका शासन में कोई भाग न था। उनके गवर्नर उच्च वर्ग के कुलीन लोग थे और राज्य से वेतन के रूप में बहुत धन पाते थे। इनका काम केवल राज दरबार में पड़े रहकर ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करना रह गया था। शासन का वास्तविक कार्य दूसरे प्रकार के 34 प्रान्तों में होता था। ये प्रान्त जेनेरालिते कहलाते थे। इनका शासन राजा द्वारा नियुक्त एतांदां द्वारा किया जाता था। यह अधिकारी उच्च बुर्जुआ या कुलीन वंश के होते थे और राजा के प्रति उत्तरदायी थे। वे स्थानीय शान्ति, सुरक्षा, कर संग्रह आदि का निरीक्षण एवं नियंत्रण करते थे। पार्लमों के अतिरिक्त शेष न्यायालयों की अध्यक्षता एतांदां ही करते थे। व्यवहार में एतांदा की शक्तियों पर कोई प्रतिबन्ध न था। १ जनता की आवश्यकता या कठिनाइयों की ओर ध्यान न देकर केवल राजा की आज्ञा का पालन करते और अपनी आय बढ़ाने का प्रयत्न करते रहते थे। अपने प्रान्त में उनकी शक्ति उसी प्रकार असीमित थी जैसी कि केन्द्र में राजा की।

फ्रांस में स्थानीय स्वशासन

फ्रांस में स्थानीय स्वशासन का कोई अस्तित्व न था । स्थानीय प्रशासन भी वाय राजमहल से ही संचालित होता था। किसी व्यक्ति अथवा संस्था को सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य करने का अधिकार प्राप्त नहीं था। स्थानीय कर्मचारियों को छोटी-छोटी बातों के लिए राजधानी से आदेश प्राप्त करना पड़ता था। इस प्रकार प्रशासन में जनता का हाथ न होने के कारण उसे प्रशासन का अनुभव प्राप्त न हो सका । यही कारण है कि क्रान्ति काल में जब जनता ने शासन सूत्र अपने हाथ में लिया तो उसने अनेक भूलें की।

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