शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्य (National Aims of Education)

शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्य (National Aims of Education)

6.3.5 पंथनिरपेक्षता की प्राप्ति

बहु धा कई स्थानों पर इसे धर्म निरपेक्षता कह दिया जाता है परन्तु धर्म शब्द एक विस्तृत अवधारणा है भारतीय जीवन उससे विमुख नहीं हो सकता, जिसकी आवश्यकता सम्पूर्ण मानवता के लिए है मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताये गये है।

धृतिः क्षमा, दमो अस्तेयः शौचमिन्द्रिय निग्रहः
धीर्विद्यासत्यमऽक्रोधो दशकम् धर्म लक्षणम् ।।

शिक्षा द्वारा उत्पादन में वृद्धि

जिनसे परे मानवता की कल्पना नहीं की जा सकती । अत: धर्म निरपेक्षता के स्थान पर विद्वानों ने पंथ निरपेक्षता शब्द अधिक प्रासंगिक स्वीकार किया है, जिसका निहितार्थ है। व्यक्ति का व्यवहार किसी सम्प्रदायक पंथ पूजा पद्धति से निरपेक्ष होकर राष्ट्रीय व्यवहार का अंग बने । सीधी-सीधी बात है कि पूजा पद्धति, सम्प्रदाय, पंथ से ऊपर उठकर राष्ट्रीय आधार पर चिन्तन और व्यवहार का प्रशिक्षण शिक्षा के विभिन्न अंगों द्वारा दिया जाये भारत में विभिन्न धर्म और सम्प्रदाय के लोग सामासिक रूप से रहते है । किसी एक सम्प्रदाय के विचार दूसरे सम्प्रदाय के विरोधी हो सकते है | पूजा पद्धतियों, खान-पान, रहन-सहन, विश्वासों में अन्तर हो सकता है । शिक्षा द्वारा बालकों में एक दूसरे के विश्वासों का सम्मान करना सिखाया जाना चाहिए। जिससे पारस्परिक बन्धुता और एकता में बाधा उत्पन्न न हो । यद्यपि भारतीय सभ्यता अनेकों प्रकार की पूजा पद्धतियों को एक साथ स्वीकृत करती है । जैसे – एक मन्दिर में शैव, वैश्णव, शक्त पूजा पद्धति संभव है । उसी प्रकार मुस्लिम, इसाई, यहूदी परम्परायें भी एक साथ समान रूप से स्थापित की जा सकती है । जिससे पंथ निरपेक्षता के भाव के विकास में सहयोग प्राप्त होता है, परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा द्वारा प्रत्यक्ष रूप से इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु कुछ सीमित प्रयास ही हुए हैं । बल्कि सम्प्रदाय विशेष को अधिक महत्व देने के कारण साम्प्रदायिकता का अति उग्र स्वरूप 21 वीं सदी की प्रमुख समस्या है । वस्तुतः राजनीति के पृथकतावादी सिद्धान्त के द्वारा साम्प्रदायिक तुष्टीकरण करने के कारण पंथ निरपेक्षता के उद्देश्य की प्राप्ति संभव नहीं हो सकी है।

स्वतंत्रता का संरक्षण

स्वतंत्र भारत में धर्म निरपेक्षता पर जितना कहा व लिखा गया हैं उतना किसी अन्य समस्या पर चिन्तन नहीं किया गया, परन्तु नेतृत्व की विभाजनकारी नीतियों ने शिक्षा को पंथ निरपेक्ष होने ही नही दिया । धार्मिक संस्थानों में धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर निजी हितों के पोषण के लिए साम्प्रदायिकता का विष रूपी बीज रोपा जाता है जो आतंककारी विध्वंसक गति विधि के रूप में राष्ट्र की अखण्डता को प्रभावित करने का प्रयत्न करता है । सच्चे अर्थों में देखा जाय तो भारत-राष्ट्र ने अपने राष्ट्रीय धर्म की उपेक्षा की है । शिक्षा संगठन में छद्म धर्म निरपेक्षता को बढ़ावा देने का निर्बल प्रयत्न किया गया है, जो प्रभावी नहीं रहा । वास्तव में मानव धर्म का प्रशिक्षण ही धर्म निरपेक्षता का आधार है । वैज्ञानिक सोच और तार्किक चिन्तन विशाल हृदय का विकास करते है । अतिः स्पष्ट है कि शिक्षा के विभिन्न पक्षों द्वारा पक्ष निरपेक्षता के उद्देश्य की प्राप्ति हेतु इसे शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य स्वीकार किया जाना चाहिए ।

6.3.6 लोकतांत्रिक दृष्टि का विकास

लोकतंत्र प्रायः एक शासन प्रणाली के रूप में विवेचित होता है । लोकतंत्रीय राष्ट्र के नागरिक होने के नाते लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास की स्थापना, शिक्षा द्वारा की जानी चाहिए। साथ ही लोकतांत्रिक जीवन शैली का प्रशिक्षण भी शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए । यदि लोकतंत्र में आमजन लोकतंत्र की प्रणाली से प्रशिक्षित नहीं होते तो शीघ्र ही लोकतंत्र समाज के अपराधिक तत्वों के हाथ में चला जाता है । भारतीय लोकतंत्र की यही विडम्बना है । यद्यपि वोट का अधिकार सबको दे दिया गया, लेकिन वोट की महत्ता का ज्ञान आमजन को नहीं कराया गया । इसीलिए देश में सदैव अल्पमत की सरकारें बनती है । राष्ट्रीय स्तर पर मतदान का प्रतिशत 50 से 60 प्रतिशत के बीच रहता है । जिससे मत विभाजन दवारा सदैव अल्पमत की सरकारें बनती है । जिसे मात्र 25 से 30 प्रतिशत जनता का समर्थन प्राप्त होता है ।

इसके साथ लोकतंत्र सिर्फ शासन प्रणाली नहीं है। शासन दवारा सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना तभी संभव होगी जब आम नागरिक लोकतंत्रीय दृष्टि का विकास कर एकतंत्रीय चिन्तन से किनारा कर ले । लोकतंत्रीय दृष्टि की आत्मा है । सत्य सिर्फ एक व्यक्ति के पास नहीं है, बल्कि सारे व्यक्तित्व पूर्ण है । उनमें सत्य विद्यमान है अत: किसी व्यक्तित्व की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए | परिवार, कार्यस्थल, यात्रा स्थल, पूजा स्थल खेल का मैदान यदि सभी स्थानों में लोकतांत्रिक जीवन दिखायी देगा तभी लोकतंत्र की संस्थाये पुष्ट होंगी और सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र स्थापित हो सकेगा । महात्मा गांधी ने लोकतंत्र की स्थापना के लिए सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के प्रशिक्षण को आवश्यक माना है । जब तक व्यक्ति के अहं के साथ परम बराबरी प्राप्त नहीं करेगा, लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो सकेगी । इसके लिए शिक्षा ही एक मात्र माध्यम है । अत: यह राष्ट्रीय शिक्षा का अनिवार्य उद्देश्य स्थापित हो जाता है।

6.3.7 राष्ट्रीय एकता का विकास

कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम एकीकृत राष्ट्र है । हमारे हित साझा है । यह विशाल भूखण्ड हमारी माता के समान है । इस मिट्टी का एक-एक कण हमारे लिए पूजनीय है । क्षेत्रीय आधार पर किसी भी प्रकार के विभाजन को रोकने का एक मात्र तरीका है, वहां के निवासियों के मन में सम्पूर्ण भारत के साथ एक जुडाव का अनुभव कराना, यह जुड़ाव तभी होगा, जब विभाजनकारी शक्तियों को कुचल कर प्रत्येक गांव प्रत्येक व्यक्ति तक राष्ट्र की पहुंच होगी । उनके हितों का पोषण हमारी व्यवस्था द्वारा संभव होगा । आज भारत के कई भागों में विभाजनकारी शक्तियां प्रबल है | कश्मीर, पंजाब, पूर्वोत्तर, नक्सल प्रभावित मध्य क्षेत्र में विभाजनकारी शक्तियां उठ खड़ी हुई है । अत: भारत-राष्ट्र लुप्त होता जा रहा है । सेनाओं द्वारा राष्ट्रीय एकता का प्रयास एक सीमित प्रयास है । सैन्य शक्ति द्वारा राष्ट्रीय एकता लम्बे समय तक नहीं रह सकती ।

वर्तमान में आतंकवाद एक रोजगार बन गया है, जिसकी चपेट में अशिक्षित बेरोजगार नवयुवक आते है । वे संक्षिप्त पगार में राष्ट्र की विघटनकारी शक्ति को प्रोत्साहन देते है । इसके लिए जिम्मेदार तत्वों की पहचान कर उनका समाशोधन आवश्यक है । सिर्फ सरकार से यह उम्मीद करना उचित नहीं हैं हमारे समाज और शिक्षा की शिथिलता ने ऐसी विभीषिका को जन्म दिया है ।

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