आधुनिक भारत की आवश्यकताओं व आकांक्षाओं के सम्बन्ध में शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों का निर्धारण कीजिए?

आधुनिक भारत की आवश्यकताओं व आकांक्षाओं के सम्बन्ध में शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों का निर्धारण कीजिए?

राष्ट्र जीवन में यदि स्वार्थ घर कर जायेगा तो अनेक बीमारियां राष्ट्र को ग्रसित करने लगेगी । आवश्यकता है। शिक्षा के दवारा स्वस्थ राष्ट्रीय अवबोध के विकास की जहां व्यक्तिगत और क्षेत्रीय स्वार्थों को दर किनारा कर राष्ट्रीयता के विकास को महत्व दिया जा सके । अत: भारतीय शिक्षा के समक्ष राष्ट्रीय एकता का महान् उद्देश्य है । इस विशालतम चुनौती को अंगीकार करना शिक्षा के लिए अनिवार्य है ।

6.3.8 भावनात्मक एकता का विकास

पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ‘भारत एक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में है । इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना आवश्यक है । जब तक व्यक्ति और राष्ट्र के बीच तदाल्थ स्थापित नहीं होता अन्य अपेक्षायें अधूरी ही रहेंगी । वह जब तक क्षेत्रीय आधार पर अपने को पृथक करता रहेगा, राष्ट्र के साथ समरसता को स्वीकार नहीं कर सकेगा ।

प. नेहरू का कथन है- “भावात्मक एकता से मेरा अभिप्राय मन और हृदय को एक करने और पृथकता की भावना को समाप्त करने से है ।।
“By imotional Integration, I mean the integration of our hearts, the suppression of feelings of separation.- Pt Nehru

परन्तु भावात्मक एकता का अर्थ विभिन्नता की समाप्ति नहीं है । विभिन्नता तो रहेगी, विभिन्नतओ के आदर के साथ ही राष्ट्रीय अवबोध का जन्म होता है । जिससे भावात्मक एकता स्थापित होती है, यही दृढ़ होकर राष्ट्रीय एकता में परिणित हो जाती है । के. जी. सैय्यदेन के शब्दों में| “भावात्मक एकता का अर्थ विभिन्नताओं की समाप्ति नहीं है । इसका अर्थ तो यह है। कि व्यक्तियों को मतभेद का अधिकार है और अपनी इस भिन्नता को वे बिना किसी भय के तर्क के आधार पर अभिव्यक्त कर सकते है । लेकिन राष्ट्रीय एकता और आधार भूत निष्ठाओं को दृष्टि में रखते हुए ही ।”

“Emotional Integration dose not mean a leveling down of differences. It means that the people have the right to differ and express their differences reasonably and fearlessly with in the larger frame work of national unity and basic loyalties.”

6.3.9 राष्ट्रीय विकास

शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र के विकास को गति मिलनी चाहिए, देश की तात्कालिक आवश्यकताओं को देखते हुए शिक्षा को अपने स्वरुप में परिमार्जन करना चाहिये । जिससे द्रुत राष्ट्रीय विकास के लक्ष्य को प्राप्त करना संभव हो सके । शिक्षा के माध्यम से बालकों में व्यावसायिक कुशलता उत्पन्न होनी चाहिए उनके मन में श्रम के प्रति सम्मान और स्वयं को उपयोगी कुशल व्यक्ति के रूप में स्थापित करने का बोध शिक्षा द्वारा ही संभव हो सकता है । इसके लिए निरन्तर व्यवसायिक निर्देशन और परामर्श की व्यवस्था होनी चाहिए तथा रुचि और क्षमता के अनुसार बालकों के व्यवसायिक प्रशिक्षण प्राप्त होने चाहिए तभी व्यवसायिक कुशलता की उन्नति का उद्देश्य प्राप्त हो सकता है । । संयोग से भारतीय शिक्षा व्यवस्था का अधिकांश भाग कौशल विहीन साहित्यक शिक्षा देने में संलग्न है । देश के अधिकांश स्नातकों के पास, करने को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । विशेष कर कलावर्ग की शिक्षा आज शिक्षार्थी के लिए बोझ बनती जा रही है । अत: शिक्षा संगठन के आधुनिक बनाने का प्रयत्न होना चाहिए जिससे शिक्षा अपने व्यावसायिक उद्देश्यों को प्राप्ति करने में सक्षम हो सके और बालक अपनी कुशलता का उपयोग राष्ट्रीय विकास में कर सके ।

6.3.10 कुशल नेतृत्व का विकास

आज का विद्यार्थी कल राजनैतिक, प्रशासनिक, सामाजिक क्षेत्र में नेतृत्व करता है । अत: नेतृत्व के गुणों का विकास शिक्षा द्वारा किया जाना चाहिए जिसमें परिश्रम, सहनशीलता, अनुशासन, त्याग, सामाजिक-समझदारी तथा राष्ट्रीय अवबोध का प्रशिक्षण बालक के विद्यालय स्तर पर दिया जाना चाहिए । किन्हीं कारणों से देश को स्वस्थ नेतृत्व प्राप्त नहीं हो रहा है । जिससे राजनैतिक, प्रशासनिक चरित्र दूषित हो गया है, कई बार तो ऐसा लगता है कि जिन लोगों के जेल की दीवारों में कैद होना चाहिए वह राष्ट्र के निर्धारक बन गये है | परिणाम सामने है | स्वेच्छाचारी, और दुर्बल नेतृत्व का प्रभाव है कि आज राष्ट्र एक साथ अनेकों समस्याओं से जूझ रहा है । अत: शिक्षा द्वारा योग्य सत्यनिष्ठ, कर्मठ नेतृत्व को जन्म देना लोकतंत्रीय जीवन के लिए संजीवनी जैसा होगा, जिसे शिक्षा को अपना प्रमुख उद्देश्य स्वीकार करना चाहिए ।

6.3.11 राष्ट्रीय जीवन में शुचिता का विकास

भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य के समक्ष न तो संसाधनों की समस्या है, न ही उच्च योग्यता की कमी है न ही अवसरों की कमी है, वर्तमान में यदि कमी है तो आचरण में शुचिता और अनुशासन की, कर्तव्य परायणता की । हमारी सारी अच्छाइयाँ, सिर्फ एक कमी के कारण पथ से भटक जाती है । देश की कोई भी योजना अपने निर्धारित लक्ष्यों तक नहीं पहुंच पाती । अव्यवस्था उत्पन्न कर स्वयं का फायदा उठाने वाले लोगों पर नियंत्रण नहीं कर पाना हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या है जो हमारे जन-गण को धीरे-धीरे खोखला कर रही है । अत: आवश्यकता है ऐसी व्यवस्था के निर्माण की जिसमें चारित्रिक शुचिता को स्थापित विकसित किया जा सके । शिक्षा द्वारा राष्ट्रीय मूल्यों की स्थापना अपरोक्ष साधनों द्वारा की जा रही है। प्रत्यक्ष साधनों द्वारा जैसे व्यावसायिक कुशलता की स्थापना का उद्देश्य शिक्षा जगत का अनिवार्य लक्ष्य होना चाहिए | क्योंकि जिस देश में नागरिक बड़ो का आदर नहीं करते, जो सत्य नहीं कहते, न्याय को न्याय नहीं समझते तथा जो चोर बाजारी और घूस लेने से धन कमाने में अपना अपमान नहीं समझते उस देश का पतन होना निश्चित है । यदि किसी देश को उन्नति के शिखर पर चढ़ना है तो उसके नागरिकों को चरित्रवान बनना परम आवश्यक है ।।

6.3.12 राष्ट्रीय चेतना का विकास

राष्ट्रीय चेतना राष्ट्र को जीवनता प्रदान करती है जब किसी देश के नागरिक अपने जीवन की प्रत्येक गतिविधि को राष्ट्रोन्मुखी का राष्ट्रीय हितों का पोषण करते है तब उनके व्यवहार में राष्ट्रीय चेतना का दर्शन होता है । संसाधनों के दोहन करते हुये कार्य स्थल पर कार्य करते समय, यात्रा करते समय, कचरा व मल निस्तारण करते समय यदि नागरिकों में राष्ट्रीय चेतना नहीं होती तो उनके द्वारा विभिन्न अर्थों में किये गये कार्य व्यक्तिगत हित के लिए होते है जो राष्ट्र के विकास में बाधक सिद्ध होते हैं । भारतीय जीवन में संसाधनों के दोहन व उपयोग के समय, यात्रा के समय कचरा व मल निस्तारण के समय राष्ट्रीय चेतना दृष्टव्य नहीं होती । इसीलिए वन्य सम्पदा विनष्ट हो रही हैं पर्यावरण विषैला हो रहा है ।

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