लुई की धार्मिक उदारता

लुई की धार्मिक उदारता

तुई राजकाज में इतना अधिक सूब गया कि उसकी पत्नी उससे दिन में बात भी नहीं कर पाती थी। मेरी झाल्यानेत जरूरतमंद लोगों को मदद किया करती थी। उसकी देखा-देखी गरीबों को सहायता करता फैशन बन गया। तुई ने अपनी पत्नी को यह स्पष्ट कह रखा था कि वह उसे किसी भी हालत में राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करने देगा। क्रोनिन आगे लिखते हैं कि ईकालेदशी सुधारक था और वह कोस को आधुनिक बनाने के लिए प्रयत्नशील या तथा मेरी चालेल रही समर्पिता को समाज सेविका एवं सुरुचि संपन्न महिला यौ। मित्रों और दरबारियों के विश्वासघात झूठी अफवाई. लुई की धार्मिक उदारता, लुई पन्द्रह का कुशासन पादरियों के प्रति उसका कठोर रवैया. कुछ शरारती लोगों द्वारा भीड़ को सड़काला, असंतुष्ट राजनीतिज्ञों को कार्यवाहियों, वकीलों की भूमिका, तुई में हाज़िरजवाबी का न होला तथा झोताओं को मंत्रमुग्ध न कर सकने की क्षमता, आर्थिक दृष्टि से फ्रांस का दीवालिया होना, लुई द्वारा फ्रांस को घाटे से निकालने के प्रयासों का निहित स्वार्थों द्वारा विरोध, लुई की गलतियाँ, सामाजिक असमानता आदि कारणों ने मिलकर फ्रांस में क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया, ऐसे विचार, इतिहासविद् क्रोनिन ने अपनी पुस्तक ‘लुई और आंत्वानेत’ में व्यक्त किए हैं।

लुई पन्द्रह का कुशासन

किंतु साधारणतः यह माना जाता है कि फ्रांस के राजाओं की शान-शौकत एवं विलासिता पर कोई अंकुश न था। राजा, रानी और उनके सम्बन्धी तथा कृपापात्र फ्रांस की राजधानी पेरिस से बाहर बारह मील दूर वर्साय के विशाल प्रासादों में ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। यूरोप के अन्य राजाओं के लिए वर्साय के महल अपने वैभव की वजह से ईर्ष्या का कारण बने हुए थे। वर्साय में 18,000 व्यक्ति निवास करते थे जिनमें 16,000 केवल नौकर-चाकर ही थे। अन्य लोगों में राज परिवार के लोग एवं उनके अतिथि और राजा के कृपापात्र सामन्त लोग थे । अकेली रानी के 500 नौकर थे। वस्तुतः वर्साय में विलासिता एवं शान-शौकत का कोई अन्त न था । राजा और रानी अपने कृपापात्रों को खुले हाथ अनाप-शनाप धन का वितरण किया करते थे। ऐसा अनुमान है कि क्रान्ति के पूर्व वर्साय में होने वाला खर्चा 200 लाख डालर प्रतिवर्ष था । जनता की कमाई को पानी की तरह वर्साय में बहाया जाता था । बहुत अधिक अपव्ययता के कारण दरबार को “राष्ट्र की समाधि” कहा जाने लगा था।

पादरियों के प्रति उसका कठोर रवैया.

क्रान्ति से पूर्व फ्रांस की शासन प्रणाली अक्षम, अव्यवस्थित, भ्रष्ट और खर्चीली थी। एकरूपता का अभाव फ्रांस की शासन व्यवस्था की बहुत बड़ी कमजोरी थी। शासन का प्रमुख राजा था। उसकी सहायता के लिए पाँच समितियाँ थीं जो कानून बनाती, राजा की तरफ से आदेश जारी करती तथा राज्य के घरेलू तथा वैदेशिक मामलों की देखभाल करती थीं। प्रान्तीय शासन के लिए समस्त देश दो प्रकार के प्रान्तों में बँटा हुआ था। एक प्रकार के प्रान्त गवर्नमेन्ट कहलाते थे, जिनकी संख्या 40 थी। इनमें अधिकांश फ्रांस के प्राचीन प्रान्त थे और उनका शासन में कोई भाग न था। उनके गवर्नर उच्च वर्ग के कुलीन लोग थे और राज्य से वेतन के रूप में बहुत धन पाते थे।

अतिथि और राजा के कृपापात्र सामन्त

इनका काम केवल राज दरबार में पड़े रहकर ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करना रह गया था। शासन का वास्तविक कार्य दूसरे प्रकार के 34 प्रान्तों में होता था। ये प्रान्त जेनेरालिते कहलाते थे। इनका शासन राजा द्वारा नियुक्त एतांदां द्वारा किया जाता था। यह अधिकारी उच्च बुर्जुआ या कुलीन वंश के होते थे और राजा के प्रति उत्तरदायी थे। वे स्थानीय शान्ति, सुरक्षा, कर संग्रह आदि का निरीक्षण एवं नियंत्रण करते थे। पार्लमों के अतिरिक्त शेष न्यायालयों की अध्यक्षता एतांदां ही करते थे। व्यवहार में एतांदा की शक्तियों पर कोई प्रतिबन्ध न था। १ जनता की आवश्यकता या कठिनाइयों की ओर ध्यान न देकर केवल राजा की आज्ञा का पालन करते और अपनी आय बढ़ाने का प्रयत्न करते रहते थे। अपने प्रान्त में उनकी शक्ति उसी प्रकार असीमित थी जैसी कि केन्द्र में राजा की।

फ्रांस में स्थानीय स्वशासन

फ्रांस में स्थानीय स्वशासन का कोई अस्तित्व न था । स्थानीय प्रशासन भी वाय राजमहल से ही संचालित होता था। किसी व्यक्ति अथवा संस्था को सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य करने का अधिकार प्राप्त नहीं था। स्थानीय कर्मचारियों को छोटी-छोटी बातों के लिए राजधानी से आदेश प्राप्त करना पड़ता था। इस प्रकार प्रशासन में जनता का हाथ न होने के कारण उसे प्रशासन का अनुभव प्राप्त न हो सका । यही कारण है कि क्रान्ति काल में जब जनता ने शासन सूत्र अपने हाथ में लिया तो उसने अनेक भूलें की।

शासन के अन्य अंगों की भाँति कानून और न्याय के क्षेत्र में अव्यवस्था एवं अष्टाचार व्याप्त था। देश में कानूनों की कोई एक प्रामाणिक संहिता नहीं थी। पूरे देश में लगभग 385 प्रकार के न्याय-विधान प्रचलित थे। “एक कस्बे में जो बात कानूनी और सही मानी जाती थी वही बात उस स्थान से 5 मील की दूरी पर स्थित दूसरे कस्बे में गैर कानूनी समझी जाती थी।” फ्रांस में प्रचलित कानूनों की भिन्नता के सम्बन्ध में प्रसिद्ध प्रबुद्धवादी विचारक वाल्तेयर ने कहा था “किसी व्यक्ति को फ्रांस में यात्रा करते समय सरकारी कानून उसी प्रकार बदलते हुए मिलते हैं, जिस प्रकार उसकी गाड़ी के घोड़े बदलते हैं।” वहाँ कौन-सा कानून लागू होगा कोई नहीं जानता था। देश में कई प्रकार के न्यायालय थे किन्तु इन न्यायालयों के क्षेत्राधिकार अस्पष्ट थे। अतः यह ज्ञात करना मुश्किल था कि कौन से न्यायालय में किस विवाद का निर्णय होगा।

न्यायालयों के क्षेत्राधिकार

न्यायिक पदों को बेचने की परम्परा से न्यायिक व्यवस्था बदतर हो गई थी। पैसे पर आधारित व्यवस्था में तीसरे वर्ग के लोग तो न्याय की आशा ही नहीं कर सकते थे। राजा की विशेष मुद्रा वाले पत्रों द्वारा किसी भी व्यक्ति को बिना अभियोग के जेल में डाल दिया जाता था । दिदरो और वाल्तेयर जैसे विचारकों को बास्तील के दुर्ग में कैद की सजा भुगतनी पड़ी थी। दण्ड व्यवस्था कठोर एवं पक्षपातपूर्ण थी। कुछ अपराधों के लिए कुलीन वर्ग के लोगों को किसी प्रकार की सजा नहीं मिलती थी। किसी-किसी मामले में जागीरदार न्यायाधीश का काम करने के साथ-साथ वादी अथवा प्रतिवादी का काम भी कर सकता था। न्याय प्रणाली की एक बुराई यह भी थी कि अदालतों की भाषा लैटिन थी जिसे फ्रांसीसी भाषा जानने वाली आम जनता समझ न पाती थी। सामाजिक व्यवस्था काशन फ्रांसीसी समाज विषम एवं विघटित था । वह सामन्तवादी पद्धति, असमानता और विशेषाधिकार के मूलभूत सिद्धान्तों पर आधारित था। समाज मुख्यतः तीन दर्गों में विभक्त था-पादरी, कुलीन वर्ग और सर्वसाधारण वर्ग। उच्च पादरी (प्रथम एस्टेट) एवं कुलीन (द्वितीय एस्टेट) सुविधा प्राप्त वर्ग थे और कृषक, मजदूर तथा मध्यम श्रेणी के लोग (तृतीय एस्टेट) सुविधाहीन वर्ग में थे।

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