संविधान सभा चर्च के संगठन और स्वरूप में भारी परिवर्तन

संविधान सभा चर्च के संगठन और स्वरूप में भारी परिवर्तन

संविधान सभा में 17911 में फ्रांस के इतिहास में पहली बार संविधान का नि किया । फ सि के नये संविधान में दो प्रमुख बातों पर बल दिया गया-

(1) राय सार्वभौम शक्ति जनता में निहित है।

(2) शक्ति का केन्द्रीयकरण राज्य एवं जनता के में है अर्थात् व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका का शक्तियों के चक्कर सिद्धान्त पर गठन | नये संविधान के अनुसार शसि की शासन पद्धति का रूप राजतंत्रीय बना रहा परंतु राजा के अधिकारों को सीमित किया गया। माना और का पूर्व घोषणा को वैधानिक रूप दे दिया गया। इनमें कुछ नई बातें जोकी गई से बाहर जाने का अधिकार, संपत्ति के लिए मुआवजा पाने का अधिकार, शिकायत ने का अधिकार राज्य का पुनर्गठन किया गया। प्रशासन के लिए राज्य को विभागों, और कम्यूनों में बाँटा गया। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कम्यून थी। नवीन सिन विधान के अनुसार देश में पहली बार सही अर्थों में व्यवस्थापिका सभा की स्थापना की गयी, जिसकी सदस्य सख्या 745 रखी गयी और उसका कार्यकाल दो वर्ष रखा गया।

शक्ति का केन्द्रीयकरण

स्थापिका समा के गठन के लिए निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की गई । निर्वाचन के लिए नागरिकों को दो भागों में बाँटा गया। प्रथम, सक्रिय नागरिक तथा द्वितीय, निष्क्रिय नागरिक। यह विभाजन क्रमशः वोट देने और न देने के आधार पर किया गया था। निर्वाचन के लिए मतदाताओं की आर्थिक योग्यता को आधार बनाया गया। जिन नागरिकों की अवस्था कम से कम 25 वर्ष की थी, जो कम से कम 3 दिन की आय कर के रूप में देते थे और जिनके नाम नगरपालिका के रजिस्टरों में तथा राष्ट्रीय रक्षक दल में दर्ज थे, वे सक्रिय नागरिकों की कोटि में रखे गये। सक्रिय नागरिकों को भी वोट देने का अधिकार अप्रत्यक्ष ही था | सक्रिय नागरिक प्रति सौ नागरिकों के लिए एक निर्वाचक चुनते थे। निर्वाचकों में वही व्यक्ति चुना जाता था जो सम्पत्ति का स्वामी था तथा वर्ष में 10 दिन की आय कर के रूप में देता था । निर्वाचकों का निर्वाचक मण्डल प्रतिनिधि (डिप्टी) चुनता था ।

निर्वाचन के लिए मतदाताओं की आर्थिक योग्यता को आधार

प्रतिनिधि कोई भी ऐसा सक्रिय सदस्य चुना जा सकता था जो भूमि का स्वामी होता और 54 फ्रैंक कर के रूप में देता। इस सभा को कानून बनाने का अधिकार दिया गया। राजा इसे भंग नहीं कर सकता था। इसकी स्वीकृति के बिना युद्ध और शान्ति की घोषणा नहीं हो सकती थी। न्याय के क्षेत्र में भी अनेक परिवर्तन किये गये | न्यायाधीशों के पदों के क्रय-विक्रय की परम्परा का अन्त कर दिया गया । न्यायाधीशों की नियुक्ति निर्वाचन के आधार पर की जाने लगी। मुद्रित पत्रों का प्रचलन बंद कर दिया गया । न्याय की दृष्टि में सभी मनुष्य समान घोषित किये गये।
फ्रास की आर्थिक दशा शोचनीय होती जा रही थी। राष्ट्रीय सभा के सामने आर्थिक समस्या एक विकट समस्या बन गयी थी। इसी बीच तालीस नामक एक बिशप ने राष्ट्रीय समा में यह प्रस्ताव रखा कि चर्च की सम्पत्ति को समाप्त कर दिया जाए। चर्च के पास कास की भूमि का पाँचवाँ हिस्सा था । यदि यह भूमि राज्य अपने अधीन कर लेता तो तका आर्थिक समस्या कुछ समय के लिए जरूर हल हो सकती थी और कुछ सीमा कर्ज चुकाने में सहायता मिल सकती थी।

न्यायाधीशों की नियुक्ति निर्वाचन के आधार पर

तालीरा के प्रस्ताव का मिराबो ने समर्थन या। राष्ट्रीय सभा में काफी वाद-विवाद हुआ। अन्त में यह प्रस्ताव 22 वोटों से पारित 13 नवम्बर, 1789 को संविधान सभा ने गिरजाघरों की सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण दिया। इस भूमि को बेचने से जो धन प्राप्त हुआ, उसके आधार पर एसाइनेटा के 1खजाने के बांड निकाले गये। एसाइनेट (आसीयाँ) मुद्रा के रूप में नहीं वरन
याजक के रूप में इस्तेमाल किये जाने लगे। यह खजाने का माड या जिस पर भातशत ब्याज दिया जाता था। ये एसाइनेट प्रारम्भ में चर्च की सम्पत्ति पर धरोहर सुशीघ्र ही कागज की नियमित करेंसी बन गये। आगे चलकर काफी संख्या में पाँच प्रतिशत व्याज एसाइनेट छापे गये जिसके परिणामस्वरूप इनके मूल्य में बहुत कमी हो गयी । कुल मिलाकर इस व्यवस्था से स्थिति सुधरने के बजाय अधिक बिगड़ी तथा चर्च कान्ति का विरोधी हो गया। इस कदम का एक लाभ यह अवश्य हुआ कि जिन लोगों ने पर्थ की भूमि खरीदी थी क्रान्ति के प्रशंसक बन गये और कुछ समय पश्चात् जब काति-विरोधी तत्वों का भय उत्पन्न हुआ तब इन्हीं लोगों ने क्रान्ति को रक्षा की।

चर्च के संगठन और स्वरूप में भारी परिवर्तन

राष्ट्रीय सभा ने चर्च के क्षेत्र में भी सुधार किये। चर्च के संगठन और स्वरूप में भारी परिवर्तन किये गये। राष्ट्रीय समा ने धार्मिक स्वतन्त्रता की घोषणा की। 3 नवम्बर, 1789 के अधिवेशन में चर्च को सम्पत्ति को जर कर लिया गया और इसे राष्ट्र की सम्पत्ति मान लिया गया। पादरियों के लिए नया संविधान लागू किया गया जिसे सिविल कांस्टीट्यूशन ऑफ दी क्लर्जी कहा जाता है। इसके अन्तर्गत कुछ उल्लेखनीय निर्णय लिये गये। ( एक विभाग (प्रांत) में केवल एक ही विशप को नियुक्ति की जा सकती थी ।

(ii) समस्त धार्मिक पदाधिकारियों को वेतन देने का उत्तरदायित्व राज्य का होगा ।

(iii) बिशप पोप के अधीन नहीं रहेंगे। अबवे राज्य के अधीन रह कर कार्य करेंगे।

(iv) पादरियों तथा विशप का निर्वाचन जनता द्वारा होगा।

सिविल कांस्टीट्यूशन

(४) निर्वाचन में रोमन कैथोलिकों के अतिरिक्त प्रोटेस्टेंट और यहूदी भी भाग ले सकते थे। इस प्रकार कांस का चर्च अब राज्य के अधीन हो गया। इस सबके अलावा पादरियों पर एक और इन्धन डाला गया। प्रत्येक पादरी को सिविल कांस्टीट्यूशन ऑफ दी क्लजी के प्रति निष्ठा लेने के कहा गया। दो-तिहाई पादरियों ने इस तरह की शपथ लेने से इन्कार कर दिया। जिन पादरियों ने शपथ लेने से इन्कार किया, वे लोग सार्वजनिक शांति व व्यवस्था के शत्रु समझे गये। उन्हें अपने पदों से पृथक कर दिया गया। कई पादरी स्वदेश छोड़कर अन्यत्र चले गये अथवा वहीं पर क्रांति के विरोध की योजना बनाने लगे। पोप पायस षष्ठ जो अभी तक शान्त था. पादरियों के इस विधान के कारण अब क्रांति का घोर आलोचक हो गया। इस प्रकार राष्ट्रीय समा के इस कार्य ने देश के अधिकांश पादरियों को असन्तुष्ट बना दिया। ये लोग क्रांति के विरोधी कुलीन जमीदारों के साथ जा मिले । अतः सिविल कांस्टीट्यूशन ने फ्र सीसी क्रांतिकारियों को और उनके विरोधियों को बिल्कुल आमने-सामने कर दिया।

जो भी हो, राष्ट्रीय सभा ने राज्य की जनता को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की और चर्च को दिया जाने वाला कर बन्द कर दिया। चर्च के एकाधिकार पर प्रहार किया। अब चर्च किसी वर्ग विशेष का न रहकर सर्वसाधारण को पहुँच के भीतर आ गया। इस प्रकार चर्च का पूर्णरूपेण लौकिकीकरण हो गया।
जहाँ तक राष्ट्रीय सभा के कार्यों के मूल्यांकन का प्रश्न है इसने पुरानी व्यवस्था का। विनाश कर नई व्यवस्था का निर्माण किया । उसका यह कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण था क्योंकि इसके फलस्वरूप ही फस अपने सामाजिक विकास के नये युग में प्रविष्ट हआ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *